Thursday, 30 June 2016
eye side weak solution (in hindi)
Wednesday, 29 June 2016
भगवान अकेला है
एक मुसलमान फकीर था। वह रात सोया ।
उसने एक स्वप्न देखा की वह स्वर्ग चला गया है।
सपने में हि लोग स्वर्ग जाते है। असलियत में तो नर्क चले जाए
लेकिन स्वप्न में कोई नर्क क्यों जाए? स्वप्न में तो कम से कम
स्वर्ग जाना चाहिए।
बड़ी भीड़ भाड़ है, लाखों लोगों की भीड़ है।
उसने पूछा की क्या बात है आज?
तो भीड़ के रास्ते चलते किसी आदमी ने कहा की
भगवान का जन्म दिन है। उसका जलसा मनाया जा रहा है।
वह मौका मिल गया। आज भगवान का जन्म दिन है,
अच्छे मौके पर में स्वर्ग आ गया।
फिर एक घोड़े पर सवार एक बहोत शानदार आदमी,
उसके साथ लाखो लोग निकले। वह झुककर लोगो से पूछता है
क्या जो घोड़े पर सवार है वे ही भगवान है ?
तो किसी ने कहा, नही वह भगवान नही है ,
यह हज़रत मोहम्मद है और उनके पीछे
उनको मानने वाले लोग है ।
एक बहोत महिमाशाली व्यक्ति है। वह पूछता है क्या ये ही भगवान है ?
किसी ने कहा नही, ये भगवान नही,
यह राम है और राम के मानने वाले लोग।
और क्राइस्ट और बुद्ध और महावीर
और जरथुस्त्र और कंफ्यूशियश और न मालुन
कितने महिमाशाली लोग निकलते है और उनकी मानने वाले लोग निकलते है।
फिर यह आदमी सोचता है की अभी भगवान नही निकले।
वे कब निकलेंगे?
और जब लोग जाने के करीब हो गए है,
रास्ता उजड़ने लगा है, कोई रास्ते पर ध्यान नही दे रहा है,
तब तक एक बूढ़ा-सा आदमी अकेले चला आ रहा है।
उसके साथ कोई भी नही है।
जिनके साथ कोई भी नही । यह अपने आप ही घोड़े पर बैठकर
चले आ रहे है, बिलकुल अकेले। तो ये चलता हुआ आदमी केहता है की
हो न हो, यह भगवान होंगे । क्यों की भगवान से अकेला
और दुनिया में कोई भी नही है ।
की महाशय आप भगवान है ? में बहुत हैरान हूँ,
मोहम्मद के साथ बहुत लोग थे, क्राइष्ट के साथ बहुत लोग थे,
राम के साथ बहुत लोग थे, सबके साथ बहुत बहुत लोग थे,
आपके साथ कोई भी नही?
सारे लोग उन्ही के बिच बंट गए है, कोई बचा ही नही जो मेरे साथ हो सके।
कोई राम के साथ, कोई कृष्ण के साथ,
मेरे साथ तो कोई भी नहीं। और मेरे साथ वही हो,
में अकेला ही हूँ !
नींद खुल गयी तो पाया वह जमीन पर अपने झोंपड़े में है।
वह पास पड़ोस में जाकर केहने लगा
की मैंने एक बहुत दुखद स्वप्न देखा है,
बिलकुल झूठा स्वप्न देखा है।
यह कैसे हो सकता है? वह फकीर मुझे भी मिला और
मैंने उससे कहा की तुमने सच्चा ही स्वप्न देखा है।
क्यों की जो हिन्दू हो सकता है वह भगवान के साथ नही हो सकता।
जो मुसलमान है वह भगवान के साथ नही हो सकता है।
जो जैन है वह भगवान के साथ नही हो सकता है।
जो कोई भी नही है, जिसका कोई विशेषण नही है,
जो किसी का अनुयायी नही है, जो किसी का शिष्य नही है,
जो बिलकुल अकेला है, जो बिलकुल नितान्त अकेला है
वही केवल उस नितान्त अकेले से जुड़ सकता है,
जो भगवान है।
बिलकुल अकेले में वह द्वार खुलता है
जो भगवान से जोड़ता है ।
भीड़ भाड़ से भगवान का कोई संबंध नही।
मूलबंध : एक सरल प्रयोग
तुम इसे बाजार में खड़े हुए कर सकते हो, किसी को पता भी नहीं चलेगा; तुम दुकान पर बैठे हुए कर सकते हो, किसी को पता नहीं चलेगा। अगर एक व्यक्ति दिन में कम से कम तीन सौ बार, क्षण भर कै मूलबंध लगा ले, कुछ महिनों बाद पाएगा, कामवासना तिरोहित हो गई। काम - ऊर्जा रह गई, वासना तिरोहित हो गई।
ध्यान विज्ञान.
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रात्रि-भोजन का भगवान महावीर ने निषेध क्यों किया
❇ रात्रि-भोजन का भगवान महावीर ने निषेध क्यों किया इस पर ओशो का दृष्टिकोण ❇
सूर्योदय के साथ ही जीवन फैलता है। सुबह होती है, सोये हुए पक्षी जग जाते है, सोये हुए पौधे जग जाते है, फूल खिलने लगते है, पक्षी गीत गाने लगते हैं, आकाश में उड़ान शुरू हो जाती है। सारा जीवन फैलने लगता है। सूर्योदय का अर्थ है, सिर्फ सूरज का निकलना नहीं, जीवन का जागना जीवन का फैलना। सूर्यास्त का अर्थ है, जीवन का सिमटना, विश्राम में लीन हो जाना। दिन जागरण है, रात्रि निद्रा है। दिन फैलाव है, रात्रि विश्राम है। दिन श्रम है, रात्रि श्रम से वापस लौट आना है। सूर्योदय की इस घटना को समझ लें तो खयाल में आयेगा कि रात्रि—भोजन के लिए महावीर का निषेध क्यों है? क्योंकि भोजन है जीवन का फैलाव। तो सूर्योदय के साथ तो भोजन की सार्थकता है। शक्ति की जरूरत है। लेकिन सूर्यास्त के बाद भोजन की जरा भी आवश्यकता नहीं है। सूर्यास्त के बाद किया गया भोजन बाधा बनेगा, सिकुड़ाव में, विश्राम में। क्योंकि भोजन भी एक श्रम है।
आप भोजन ले लेते है तो आप सोचते हैं, काम समाप्त हो गया। गले के नीचे भोजन गया तो आप समझे कि काम समाप्त हो गया। गले तक तो काम शुरू ही नहीं होता, गले के नीचे ही काम शुरू होता है। शरीर श्रम में लीन होता है। भोजन देने का अर्थ है शरीर को भीतरी श्रम में लगा देना। भोजन देने का अर्थ है कि अब शरीर का रोया—रोया इसको पचाने में लग जायेगा।
तो अगर आपकी निद्रा क्षीण हो गयी है, अगर रात विश्राम नहीं मिलता, नींद नहीं मालूम पड़ती, स्वप्न ही स्वप्न मालूम पड़ते है, करवट ही करवट बदलनी पड़ती है, उसमें से अस्सी प्रतिशत कारण तो शरीर को दिया गया काम है जो रात में नहीं दिया जाना चाहिए। तो एक तो भोजन देने का अर्थ है, शरीर को श्रम देना। लेकिन जब सूरज उगता है तो आक्सीजन की, प्राणवायु की मात्रा बढ़ती है। प्राण वायु जरूरी है श्रम को करने के लिए। जब रात्रि आती है, सूर्य डूब जाता है तो प्राण वायु का औसत गिर जाता है हवा में। जीवन को अब कोई जरूरत नहीं है। कार्बन डाइआक्साइड़ का, कार्बन द्वि औषद की मात्रा बढ़ जाती है जो कि विश्राम के लिए जरूरी है। जानकर आप हैरान होंगे कि आक्सिजन जरूरी है भोजन को पचाने के लिए। कार्बन द्वि औषद के साथ भोजन मुश्किल से पचेगा।
मनोवैज्ञानिक अब कहते है कि हमारे अधिकतर दुख स्वप्नों का कारण हमारे पेट में पड़ा हुआ भोजन है। हमारी निद्रा की जो अस्त—व्यस्तता है, अराजकता है, उसका कारण पेट में पड़ा हुआ भोजन है। आपके सपने अधिक मात्रा में आपके भोजन से पैदा हुए है। आपका पेट परेशान है। काम में लीन है। दिन भर चुक गया। काम का समय बीत गया और अब भी आपका पेट काम में लीन है। बाकी हम तो अदभुत लोग हैं। हमारा असली भोजन रात में होता है, बाकी तो दिन भर हम काम चला लेते है। जो असली भोजन है, बडा भोजन डिनर, वह हम रात में लेते हैं। उससे ज्यादा दुष्टता शरीर के साथ दूसरी नहीं हो सकती।
इसलिए अगर महावीर ने रात्रि भोजन को हिंसा कहां है तो मै कहता हूं कीड़े—मकोड़ों के मरने के कारण नहीं, अपने साथ हिंसा करने के कारण आत्म—हिंसा है। आप अपने शरीर के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं। स्व—अवैज्ञानिक है। भोजन की जरूरत है सुबह, सूर्य के उगने के साथ। जीवन की आवश्यकता है, शक्ति की आवश्यकता है। श्रम होगा, शक्ति चाहिए। विश्राम होगा, शक्ति नहीं चाहिए। पेट सांझ होते—होते, होते—होते मुक्त हो जाये भोजन से, तो रात्रि शांत होगी, मौन होगी, गहरी होगी। निद्रा एक सुख होगी और सुबह आप ताजे उठेंगे, रात्रि भर भी आपके पेट को श्रम करना पड़े तो सुबह आप थके मांदे उठेंगे।
इसके और भी गहरे कारण हैं। आपने खयाल किया होगा, जैसे ही पेट में भोजन पड़ जाता है वैसे ही आपका मस्तिष्क ढीला हो जाता है। इसलिए भोजन के बाद नींद सताने लगती है। लगता है लेट जाओ। लेट जाने का मतलब यह है कि कुछ मत करो अब। क्यों? क्योंकि सारी ऊर्जा शरीर की पेट को पचाने के लिए दौड़ जाती है। मस्तिष्क बहुत दूर है पेट से। जैसे ही पेट में भोजन पड़ता है, मस्तिष्क की सारी ऊर्जा पेट में पचाने को आ जाती है। ये वैज्ञानिक तथ्य है। इसलिए आंख झपकने लगती है और नींद मालूम होने लगती है। इसलिए उपवासे आदमी को रात में नींद नहीं आती। दिन भर उपवास किया हो तो रात में नींद नहीं आती। क्योंकि सारी ऊर्जा मस्तिष्क की तरफ दौड़ती रहती है तो नींद नहीं आ पाती। इसलिए, जैसे ही आप पेट भर लेते हैं तत्काल नींद मालूम होने लगती है। यह भरे पेट में नींद इसलिए मालूम होती है कि मस्तिष्क को जो ऊर्जा दी गयी थी, वह पेट ने वापस ले ली।
पेट जड़ है। पेट पहली जरूरत है। मस्तिष्क विलास है, लक्ज़री है। जब पेट के पास ज्यादा ऊर्जा होती है तब वह मस्तिष्क को दे देता है। नहीं तो पेट में ही मस्तिष्क की ऊर्जा घूमती रहती है।
महावीर ने कहां है, दिन है श्रम, रात्रि है विश्राम, ध्यान भी है विश्राम। इसलिए पूरी रात्रि ध्यान बन सकती है, अगर थोड़ा—सा शरीर के साथ समझ का उपयोग किया जाये। अगर रात्रि पेट में भोजन पड़ा है तो रात्रि ध्यान नहीं बन सकती, निद्रा ही रह जायेगी।
महावीर वाणी
ओशो
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