Tuesday, 24 May 2016

रात्रि-भोजन का भगवान महावीर ने निषेध क्यों किया

❇ रात्रि-भोजन का भगवान महावीर ने निषेध क्यों किया इस पर ओशो का दृष्टिकोण ❇

सूर्योदय के साथ ही जीवन फैलता है। सुबह होती है, सोये हुए पक्षी जग जाते है, सोये हुए पौधे जग जाते है, फूल खिलने लगते है, पक्षी गीत गाने लगते हैं, आकाश में उड़ान शुरू हो जाती है। सारा जीवन फैलने लगता है। सूर्योदय का अर्थ है, सिर्फ सूरज का निकलना नहीं, जीवन का जागना जीवन का फैलना। सूर्यास्त का अर्थ है, जीवन का सिमटना, विश्राम में लीन हो जाना। दिन जागरण है, रात्रि निद्रा है। दिन फैलाव है, रात्रि विश्राम है। दिन श्रम है, रात्रि श्रम से वापस लौट आना है। सूर्योदय की इस घटना को समझ लें तो खयाल में आयेगा कि रात्रि—भोजन के लिए महावीर का निषेध क्यों है? क्योंकि भोजन है जीवन का फैलाव। तो सूर्योदय के साथ तो भोजन की सार्थकता है। शक्ति की जरूरत है। लेकिन सूर्यास्त के बाद भोजन की जरा भी आवश्यकता नहीं है। सूर्यास्त के बाद किया गया भोजन बाधा बनेगा, सिकुड़ाव में, विश्राम में। क्योंकि भोजन भी एक श्रम है।

आप भोजन ले लेते है तो आप सोचते हैं, काम समाप्त हो गया। गले के नीचे भोजन गया तो आप समझे कि काम समाप्त हो गया। गले तक तो काम शुरू ही नहीं होता, गले के नीचे ही काम शुरू होता है। शरीर श्रम में लीन होता है। भोजन देने का अर्थ है शरीर को भीतरी श्रम में लगा देना। भोजन देने का अर्थ है कि अब शरीर का रोया—रोया इसको पचाने में लग जायेगा।

तो अगर आपकी निद्रा क्षीण हो गयी है, अगर रात विश्राम नहीं मिलता, नींद नहीं मालूम पड़ती, स्‍वप्‍न ही स्‍वप्‍न मालूम पड़ते है, करवट ही करवट बदलनी पड़ती है, उसमें से अस्सी प्रतिशत कारण तो शरीर को दिया गया काम है जो रात में नहीं दिया जाना चाहिए। तो एक तो भोजन देने का अर्थ है, शरीर को श्रम देना। लेकिन जब सूरज उगता है तो आक्सीजन की, प्राणवायु की मात्रा बढ़ती है। प्राण वायु जरूरी है श्रम को करने के लिए। जब रात्रि आती है, सूर्य डूब जाता है तो प्राण वायु का औसत गिर जाता है हवा में। जीवन को अब कोई जरूरत नहीं है। कार्बन डाइआक्साइड़ का, कार्बन द्वि औषद की मात्रा बढ़ जाती है जो कि विश्राम के लिए जरूरी है। जानकर आप हैरान होंगे कि आक्सिजन जरूरी है भोजन को पचाने के लिए। कार्बन द्वि औषद के साथ भोजन मुश्किल से पचेगा।

मनोवैज्ञानिक अब कहते है कि हमारे अधिकतर दुख स्वप्‍नों का कारण हमारे पेट में पड़ा हुआ भोजन है। हमारी निद्रा की जो अस्त—व्यस्तता है, अराजकता है, उसका कारण पेट में पड़ा हुआ भोजन है। आपके सपने अधिक मात्रा में आपके भोजन से पैदा हुए है। आपका पेट परेशान है। काम में लीन है। दिन भर चुक गया। काम का समय बीत गया और अब भी आपका पेट काम में लीन है। बाकी हम तो अदभुत लोग हैं। हमारा असली भोजन रात में होता है, बाकी तो दिन भर हम काम चला लेते है। जो असली भोजन है, बडा भोजन डिनर, वह हम रात में लेते हैं। उससे ज्यादा दुष्टता शरीर के साथ दूसरी नहीं हो सकती।

इसलिए अगर महावीर ने रात्रि भोजन को हिंसा कहां है तो मै कहता हूं कीड़े—मकोड़ों के मरने के कारण नहीं, अपने साथ हिंसा करने के कारण आत्म—हिंसा है। आप अपने शरीर के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं। स्व—अवैज्ञानिक है। भोजन की जरूरत है सुबह, सूर्य के उगने के साथ। जीवन की आवश्यकता है, शक्ति की आवश्यकता है। श्रम होगा, शक्ति चाहिए। विश्राम होगा, शक्ति नहीं चाहिए। पेट सांझ होते—होते, होते—होते मुक्त हो जाये भोजन से, तो रात्रि शांत होगी, मौन होगी, गहरी होगी। निद्रा एक सुख होगी और सुबह आप ताजे उठेंगे, रात्रि भर भी आपके पेट को श्रम करना पड़े तो सुबह आप थके मांदे उठेंगे।

इसके और भी गहरे कारण हैं। आपने खयाल किया होगा, जैसे ही पेट में भोजन पड़ जाता है वैसे ही आपका मस्तिष्क ढीला हो जाता है। इसलिए भोजन के बाद नींद सताने लगती है। लगता है लेट जाओ। लेट जाने का मतलब यह है कि कुछ मत करो अब। क्यों? क्योंकि सारी ऊर्जा शरीर की पेट को पचाने के लिए दौड़ जाती है। मस्तिष्क बहुत दूर है पेट से। जैसे ही पेट में भोजन पड़ता है, मस्तिष्क की सारी ऊर्जा पेट में पचाने को आ जाती है। ये वैज्ञानिक तथ्य है। इसलिए आंख झपकने लगती है और नींद मालूम होने लगती है। इसलिए उपवासे आदमी को रात में नींद नहीं आती। दिन भर उपवास किया हो तो रात में नींद नहीं आती। क्योंकि सारी ऊर्जा मस्तिष्क की तरफ दौड़ती रहती है तो नींद नहीं आ पाती। इसलिए, जैसे ही आप पेट भर लेते हैं तत्काल नींद मालूम होने लगती है। यह भरे पेट में नींद इसलिए मालूम होती है कि मस्तिष्क को जो ऊर्जा दी गयी थी, वह पेट ने वापस ले ली।

पेट जड़ है। पेट पहली जरूरत है। मस्तिष्क विलास है, लक्ज़री है। जब पेट के पास ज्यादा ऊर्जा होती है तब वह मस्तिष्क को दे देता है। नहीं तो पेट में ही मस्तिष्क की ऊर्जा घूमती रहती है।

महावीर ने कहां है, दिन है श्रम, रात्रि है विश्राम, ध्यान भी है विश्राम। इसलिए पूरी रात्रि ध्यान बन सकती है, अगर थोड़ा—सा शरीर के साथ समझ का उपयोग किया जाये। अगर रात्रि पेट में भोजन पड़ा है तो रात्रि ध्यान नहीं बन सकती, निद्रा ही रह जायेगी।

महावीर वाणी

ओशो

अहंकारी

**कुंड़लिनी******
झेन फकीर बोकोजू का एक शिष्य ध्यान कर रहा है
वह रोज ध्यान करता है, रोज सुबह गुरु के पास आकर निवेदन करता है, क्या अनुभव हुआ
और गुरु उसे भगा देता है उसी वक्त, वह कहता है कि ये छोड़ो, फालतू बातें मत लाओ यहां
कभी लाता है कि कुंड़लिनी जग गयी और गुरु कहता है, भाग यहां से
फिजूल की बातें न ला यहां, जब तक शून्य न घटे तब तक फिजूल की बातें न ला मगर वह फिर आता है, फिर आता है
कि आज हृदयकमल खुल गया और वह गुरु तो डंडा उठा लेता है
कभी वह कहता है कि सहस्रार खुल गया
और गुरु उसको धक्के देकर बाहर निकाल देता है
और कहता है, जब तक शून्य न खुले, तब तक तू आ ही मत
फिर महीनों बीत गये
फिर एक दिन वह आया है, अब बड़ा आनंदित है, चरणों में पड़ गया, उसने कहा कि आज वह ले आया हूं जिसकी आप इतने दिन से मुझसे अपेक्षा करते थे,
आशा करते थे। आज आप निश्चित प्रसन्न होंगे
आज मैं शून्य होकर आ गया हूं। गुरु ने तो डंडा उठाकर उसके सिर पर मार दिया, उसने कहा, शून्य को बाहर फेंककर आ
वह कहने लगा, अब तो मैं शून्य होकर आ गया, अब भी हटाते हैं
तो उन्होंने कहा अभी जब तू दावा करता है कि मैं शून्य हो गया, तो दावेदार कौन है? यह नया दावा है, अहंकार की नयी शक्ल है
यह नया मुखौटा है
शून्य तो कोई तभी होता है जब शून्य भी फेंक आता है
तब कहने को कुछ भी नहीं बचता
परम शून्य तो वही है जो यह भी नहीं कह सकता कि मैं शून्य हू
कहने की कहां गुंजाइश है
कहा कि गलत हुआ। कहा कि दावा हुआ
यही अर्थ है अष्टावक्र के इस वचन का—आत्मज्ञानी है भी नहीं
अहंकार तो .गया, इसलिए यह कहना तो ठीक नहीं कि आत्मज्ञानी है
नहीं है
और नहीं भी नहीं है
कयोंकि आत्मज्ञानी यह भी नहीं कह सकता कि मैं शून्य हो गया,
निर— अहंकारी हो गया
आत्मज्ञानी कुछ भी नहीं कह सकता
क्योंकि कहने में तो फिर हो जाएगा
उदघोषणाएं तो सभी अहंकार की हैं
विनम्रता की उदघोषणा भी
शून्य होने की उदघोषणा भी.
अष्‍टावक्र: महागीता–(भाग–6) प्रवचन–86

Saturday, 26 March 2016

भयभीत आदमी

एक मित्र हैं मेरे। पत्नी मर गयी है उनकी। तो पत्नी की तस्वीरें सारे मकान में, द्वार-दरवाजे पर सब जगह लगा रखी हैं। किसी से मिलते-जुलते नहीं, तस्वीरें ही देखते रहते हैं। उनके किसी मित्र ने मुझसे कहा, ऐसा प्रेम पहले नहीं देखा। अदभुत प्रेम है। मैंने कहा, प्रेम नहीं है। वह आदमी अब डरा हुआ है। अब कोई भी दूसरी स्त्री उसके जीवन में प्रवेश कर सकती है। और ये तस्वीरें लगाकर अब वह पहरा लगा रहा है।
उन्होंने कहा– आप कैसी बात करते हैं?
मैंने कहा– मैं चलूंगा, मैं उन्हें जानता हूं।
और जब मैंने उन मित्र को कहा– सच बोलो, सोचकर बोलो, ठीक से विचार करके बोलो। अब तुम दूसरी स्त्रियों से भयभीत तो नहीं हो?
उन्होंने कहा– आपको यह कैसे पता चला? यही डर है मेरे मन में कि कहीं मैं अपनी पत्नी के प्रति विश्वासघाती सिद्ध न हो जाऊं। इसलिए उसकी याद को चारों तरफ इकट्ठी करके बैठा हुआ हूं। किसी स्त्री से मिलने में भी डरता हूं।
आदमी का मन बहुत जटिल है। और अब यह हवा भी चारों तरफ फैल गयी है कि पत्नी के प्रति इतना प्रेम है कि जो दो साल पहले पत्नी मर गयी, उसको वह जिलाये हुए हैं अपने मकान में। यह हवा भी उनकी सुरक्षा का कारण बनेगी। यह हवा भी उन्हें रोकेगी। यह प्रतिष्ठा भी रोकेगी।
पर मैंने उन मित्र के मित्र को कहा था कि ज्यादा देर नहीं चलेगी यह सुरक्षा। जब असली पत्नी नहीं बचती, तो ये तस्वीरें कितनी देर बचेंगी?
अभी मुझे निमंत्रण पत्र आया है कि उनका विवाह हो रहा है। यह ज्यादा दिन नहीं बच सकता। इतना भयभीत आदमी ज्यादा दिन नहीं बच सकता। इतना असुरक्षित आदमी ज्यादा दिन नहीं बच सकता।
वस्तुओं पर, व्यक्तियों पर जो हम “मेरे’ का फैलाव करते हैं, महावीर उसको भी हिंसा कहते हैं। महावीर परिग्रह को हिंसा कहते हैं। महावीर का वस्तुओं से कोई विरोध नहीं है, और न महावीर को इससे कोई प्रयोजन है कि आपके पास कोई वस्तु है या नहीं। महावीर का इससे जरूर प्रयोजन है कि आपका उससे कितना मोह है। कितना उसको आप पकड़े हुए हैं, कितना आपने उस वस्तु को अपनी आत्मा बना लिया है।
महावीर वाणी, भाग-१, प्रवचन-५, ओशो

मन वेश्या की तरह है।

मन वेश्या की तरह है।
किसी का नहीं है मन। आज यहां, कल वहां; आज इसका, कल उसका। मन की कोई मालकियत नहीं है। और मन की कोई ईमानदारी नहीं है। मन बहुत बेईमान है। वह वेश्या की तरह है। वह किसी एक का होकर नहीं रह सकता। और जब तक तुम एक के न हो सको, तब तक तुम एक को कैसे खोज पाओगे? न तो प्रेम में मन एक का हो सकता है; न श्रद्धा में मन एक का हो सकता है—और एक के हुए बिना तुम एक को न पा सकोगे। तो कहीं तो प्रशिक्षण लेना पड़ेगा—एक के होने का।
इसी कारण पूरब के मुल्कों ने एक पत्नीव्रत को या एक पतिव्रत को बड़ा बहुमूल्य स्थान दिया। उसका कारण है। उसका कारण सांसारिक व्यवस्था नहीं है। उसका कारण एक गहन समझ है। वह समझ यह है कि अगर कोई व्यक्ति एक ही स्त्री को प्रेम करे, और एक ही स्त्री का हो जाए, तो शिक्षण हो रहा है एक के होने का। एक स्त्री अगर एक ही पुरुष को प्रेम करे और समग्र—भाव से उसकी हो रहे कि दूसरे का विचार भी न उठे, तो प्रशिक्षण हो रहा है; तो घर मंदिर के लिए शिक्षा दे रहा है; तो गृहस्थी में संन्यास की दीक्षा चल रही है। अगर कोई व्यक्त्ति एक स्त्री का न हो सके, एक पुरुष का न हो सके, फिर एक गुरु का भी न हो सकेगा; क्योंकि उसका कोई प्रशिक्षण न हुआ। जो व्यक्ति एक का होने की कला सीख गया है संसार में, वह गुरु के साथ भी एक का हो सकेगा। और एक गुरु के साथ तुम न जुड़ पाओ तो तुम जुड़ ही न पाओगे। वेश्या किसी से भी तो नहीं जुड़ पाती। और बड़ी, आश्चर्य की बात तो यह है कि वेश्या इतने पुरुषों को प्रेम करती है, फिर भी प्रेम को कभी नहीं जान पाती।
अभी एक युवती ने संन्यास लिया। वह आस्ट्रेलिया में वेश्या का काम करती रही। उसने कभी प्रेम नहीं जाना। यहां आकर वह एक युवक के प्रेम में पड़ गई, और पहली दफा उसने प्रेम जाना। और उसने मुझे आकर कहा कि इस प्रेम ने ही मुझे तृप्त कर दिया; अब मुझे किसी की भी कोई जरूरत नहीं है। और उसने कहा कि आश्चर्यों का आश्चर्य तो यह है कि मैं तो बहुत पुरुषों के संबंध में रही; लेकिन मुझे प्रेम का कभी अनुभव ही नहीं हुआ। प्रेम का अनुभव हो ही नहीं सकता बहुतों के साथ। बहुतों के साथ केवल ज्यादा से ज्यादा शरीर का भोग, उसका अनुभव हो सकता है। एक के साथ आत्मा का अनुभव होना शुरू होता है; क्योंकि एक में उस परम एक की झलक है। छोटी झलक है, बहुत छोटी; लेकिन झलक उसी की है।-ओशो - सुन भई साधो–(प्रवचन–17)

Tuesday, 15 March 2016

विचार भी आकृति रखता है:

विचार भी आकृति रखता है:~
प्रत्येक विचार का आकार है। और आपके भीतर प्रतिपल आकार बदलते रहते हैं।    आपके चेहरे पर भी आकार छप जाते हैं।
जो आदमी निरंतर क्रोध करता है,
वह जब नहीं भी क्रोध करता है,
तब भी लगता है, क्रोध में है।
वह निरंतर क्रोध की जो आकृति है,
उसके चेहरे पर स्थायी हो जाती है
और फिर चेहरा उसको छोड़ता नहीं।
क्योंकि चेहरे को पता है कि
कभी भी अभी थोड़ी देर में फिर जरूरत पड़ेगी।
वह पकड़े रखता है,
जस्ट टु बी इफिशिएंट, कुशल होने की दृष्टि से।
अब ठीक है, जब बार-बार जरूरत पड़ती है,
तो उसको हटाने की आवश्यकता भी क्या है!
जब तक हटाएंगे, तब तक पुनः आवश्यकता आ जाएगी।
तो रहने दो।
तो फिक्स्ड इमेज बैठ जाती है चेहरे पर, सभी लोगों के।
और कभी-कभी तो ऐसा हो जाता है कि पीछा ही नहीं छोड़ता।
हजरत मूसा के संबंध में सुना है।
हजरत मूसा दुनिया के उन थोड़े-से लोगों में एक हैं,
कृष्ण या बुद्ध या महावीर जैसे।
एक सम्राट ने अपने चित्रकार को कहा कि
तू जा और हजरत मूसा का एक चित्र बना ला।
हजरत मूसा जिंदा थे। वह चित्रकार गया और चित्र बना लाया।
सम्राट ने चित्र देखा और उसने कहा कि
जो कुछ हजरत मूसा के संबंध में मैंने सुना है
उसमें और इस चित्र में बहुत फर्क मालूम पड़ता है।
यह चित्र देखकर मालूम पड़ता है कि
किसी बहुत दुष्ट, हिंसक, क्रोधी आदमी का चित्र है।
इसमें हजरत मूसा की खबर नहीं मिलती।
उस चित्रकार ने कहा कि आश्चर्य!
आपने कभी हजरत मूसा को देखा?
उस सम्राट ने कहा, मैंने देखा नहीं है,
सुना है उनके बाबत; और उनसे मेरा लगाव भी बन गया।
इसीलिए तो चित्र बनाने तुझे भेजा।
तो उसने कहा कि मैं देखकर आ रहा हूं।
महीनों बैठकर इस चित्र को मैंने बनाया है।
इसमें रत्तीभर भूल नहीं है।
और हजरत मूसा से पूछकर आया हूं कि
चित्र ठीक बन गया जनाब!
उन्होंने कहा कि बिलकुल ठीक है। तब आया हूं।
सम्राट ने कहा, लेकिन कहीं न कहीं कुछ न कुछ भूल है।
और मालूम होता है कि हजरत मूसा या
तो दयावश तुझसे कह दिए कि ठीक है,
या उन्होंने अपनी शक्ल कभी आईने में न देखी होगी।
और कोई कारण नहीं हो सकता।
लेकिन सम्राट की यह जिद्द,
जिसने देखा न हो मूसा को, हैरानी की थी।
चित्रकार ने कहा, फिर चलिए।
और हजरत मूसा के पास चित्रकार और सम्राट पहुंचे।
सम्राट भी थोड़ा हैरान हुआ चेहरे को देखकर।
चित्रकार ही ठीक मालूम पड़ता है।
बाजी हार गया मालूम हुआ उसे।
फिर भी पूरी बाजी हार जाने के बाद सम्राट ने मूसा से कहा कि
एक सवाल मैं पूछने आया हूं।
एक बाजी हार गया इस चित्रकार के साथ।
पूछना मुझे यही है कि जो कुछ मैंने आपके संबंध में सुना है,
उसे सुनकर मैंने आपकी एक आकृति बनाई थी,
लेकिन इस आकृति में वह बात नहीं है।
हजरत मूसा ने कहा,
यह आकृति मेरी पुरानी है
और पीछा नहीं छोड़ती।
आज से बीस साल पहले मैं ऐसा ही हुआ करता था।
जो कुछ इस चित्र में है, वही हुआ करता था। ऐसा ही क्रोधी, ऐसा ही दुष्ट, ऐसा ही हिंसा से भरा हुआ।
अब सब बदल गया, लेकिन चेहरे पर पुराने चिह्न रह गए हैं।
चिह्न छूट जाते हैं।
विचार भी आकृति रखता है,
भाव भी आकृति रखता है।
इन आकृतियों के बीच में अगर आप देख पाएं,
तो अरूप का दर्शन होता है।
दो विचार के बीच में खड़े हो जाएं,
दो विचार के बीच में झांक लें,
दो विचार के बीच में जो खाली जगह छूटे,
स्पेस बने, उसमें डूब जाएं और
आपको अरूप का दर्शन हो जाए।
भीतर अगर हो जाए,
तो फिर आप बाहर भी दो आकारों के बीच में कूद सकते हैं
और निराकार को जान सकते हैं।
कृष्ण कहते हैं, वही है ब्रह्म,
जिसका कभी नाश नहीं होता।
रूप का नाश है, अरूप का नाश नहीं, अरूप है ब्रह्म।
ऐसा सच्चिदानंद, विनाश जिसका नहीं होता, वही ब्रह्म है।
गीता दर्शन~
(भाग-4)~
(अध्याय-8)~
प्रवचन–89~
ओशो.....♡

जगह महलों में और झोपड़ों में नहीं हृदयों में होती है।

दानप्रत्येक व्यक्तिदान कर सकता है।जिसके पास कुछ भी नहीं है,वह भी खूब दान कर सकता है।और अक्सर ऐसा होता है,जिसके पास कुछ भी नहीं है,वही दान कर पाता है।क्योंकि उसे छोड़ने काडर ही नहीं होता।कुछ है ही नहीं,तो खोएगा क्या?इसलिए तुम अमीर आदमी कोकंजूस पाते हो,गरीब को कंजूस नहीं पाते।गरीब दे सकता है।ऐसे ही नहीं है।मैंने सुना है,एक गरीब आदमी की झोपड़ी पर...रात जोर की वर्षा हो रही थी।फकीर था;छोटी—सी झोपड़ी थी।स्वयं और उसकी पत्नी,दोनों सोए थे।आधी रात किसी नेद्वार पर दस्तक दी।फकीर ने अपनी पत्नी से कहा:उठ, द्वार खोल दे।पत्नी द्वार के करीब सो रही थी।पत्नी ने कहा:इस आधी रात में जगह कहां है?कोई अगर शरण मांगेगातो तुम मना न कर सकोगे।वर्षा जोर की हो रही है।कोई शरण मांगने के लिए हीद्वार आया होगा।जगह कहां है?उस फकीर ने कहा: जगह?दो के सोने के लायक काफी है,तीन के बैठने के लायक काफी होगी।तू दरवाजा खोल!लेकिन द्वार आए आदमी कोवापिस तो नहीं लौटाना है।दरवाजा खोला।कोई शरण ही मांग रहा था;भटक गया थाऔर वर्षा मूसलाधार थी।तीनों बैठकर गपशप करने लगे।सोने लायक तो जगह न थी।थोड़ी देर बादकिसी और आदमी ने दस्तक दी।फिर फकीर ने अपनी पत्नी से कहा:खोल।पत्नी ने कहा:अब करोगे क्या, जगह कहां है?अगर किसी ने शरण मांगी?उस फकीर ने कहा:अभी बैठने लायक जगह है,फिर खड़े रहेंगे;मगर दरवाजा खोल।फिर दरवाजा खोला।फिर कोई आ गया।अब वे खड़ेहोकर बातचीत करने लगे।इतना छोटा झोपड़ा!और तब अंततःएक गधे ने आकरजोर से आवाज की,दरवाजे को हिलाया।फकीर ने कहा: दरवाजा खोलो।पत्नी ने कहा:अब तुम पागल हुए हो,यह गधा है, आदमी भी नहीं!फकीर ने कहा:हमने आदमियों के कारणदरवाजा नहीं खोला था,अपने हृदय के कारण खोला था।हमें गधे और आदमी में क्या फर्क?हमने मेहमानों के लिएदरवाजा खोला था।उसने भी आवाज दी है।उसने भी द्वार हिलाया है।उसने अपना काम पूरा कर दिया,अब हमेंअपना काम पूरा करना है।दरवाजा खोलो!उसकी औरत ने कहा:अब तो खड़े होने की भीजगह नहीं है!उसने कहा:अभी हम जरा आराम से खड़े हैं,फिर सटकर खड़े होंगे।और याद रख एक बात कियह कोई अमीर का महल नहीं हैकि जिसमें जगह की कमी हो!यह गरीब का झोपड़ा है,इसमें खूब जगह है!यह कहानी मैंने पढ़ी,तो मैं हैरान हुआ।उसने कहा:यह कोई अमीर का महल नहीं हैजिसमें जगह न हो।यह गरीब का झोपड़ा है,इसमें खूब जगह है।जगह महलों में औरझोपड़ों में नहीं होती,जगह हृदयों में होती है।!! ओशो !!

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· . प्रेम आत्मा का भोजन है।

     ·    ·  ....... प्रेम आत्मा का भोजन है। प्रेम आत्मा में छिपी परमात्मा की ऊर्जा है। प्रेम आत्मा में निहित परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग ...