सुना है मैंने, एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन अपने घर के बाहर बैठा है। और गांव का जो मौलवी है, वह मस्जिद से नमाज पढ़कर लौट रहा है। अचानक बरसा आ गई, तो वह तेजी से भागा। मुल्ला ने कहा कि ठहरो! शर्म नहीं आती, धार्मिक आदमी होकर और भागते हो? वह मौलवी भी थोड़ा घबड़ाया कि धार्मिक आदमी होने से। भागने का क्या लेना—देना! उसने कहा, क्या मतलब? मुल्ला ने कहा, परमात्मा पानी बरसा रहा है और तुम भागकर परमात्मा का अपमान कर रहे हो? किसका पानी है यह? यह जल किसका है?
मौलवी भी डर गया, और अपनी इज्जत की रक्षा के लिए और पड़ोसियों को पता न चल जाए कि परमात्मा के पानी का अपमान हुआ; वह आहिस्ता—आहिस्ता घर पहुंचा, तरबतर पानी में। सर्दी पकड़ गई, बुखार आ गया, निमोनिया हो गया।
तीन दिन बाद वह अपनी खिड़की में बैठा है अपनी दुलाई ओढ़े हुए। देखा कि नसरुद्दीन बाजार से लौट रहा है। पानी की थोड़ी—सी बूंदें आईं। नसरुद्दीन भागा। उस मौलवी ने चिल्लाकर कहा कि ठहर नसरुद्दीन! भगवान का अपमान कर रहा है? नसरुद्दीन ने कहा कि नहीं; भगवान का पानी गिर रहा है, कहीं मेरा पैर उस पर न पड़ जाए और अपमान न हो जाए, इसलिए घर जा रहा हूं!
ओशो
Monday, 3 April 2017
परमात्मा के पानी का अपमान
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