Monday, 31 July 2017

colour full happy life (in hindi)

           हमारी life होली के रंगों की तरह  colourfull है मगर उसको हम black & white बना देते है! colourfull reprasant करता है आनंदित जीवन का,black & white reprasant करता है सुख और दुःख का

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 हमारी life है तो  colourfull  मगर उसको बना  देते है black & white,हमेशा उन चीजों में सुख ढूढ़ने का  प्रयास करते है जिसमे सुख है  नही,यह मानव शरीर परमत्मा की कृपा से   मिलता है तो आनन्द भी उसमेँ से हीं मिलेगा मगर हम आनन्द खोजने का प्रयास करते है सांसारिक वस्तुओ मे जिनमे आनन्द  नहीं,है।  कुछ क्षणो का सुख तो मिलता है मगर वह  भी बाद मे दुख का कारण बनता है जबकि सब जानते है जो चीज जहाँ से आती है उसको वही जाना पड़ता है आनन्द भी उसको वही से प्राप्त होता है जितना हम इस संसार के पीछे भागते है  हम परमत्मा से दुर  होते चले जाते है! actual  मे हमसे एक गलती होतीं है !


 मै सदा जीता रहूँ कभी मरुँ नहीं,मुझसे समझदार कोइ नही,मै ज्ञानी हुँ  मै सदा सूखी रहूँ !
                                                                                                                                                                               हम हमेशा अपने बारे मे गलत सोचते है ओर life को colourfull के स्थान  पर black & white बना देते है  इस संसार में कोइ ऐसा  नहीं जिसे मरना न हो, जो सुख चाहता है उसे दुख न  मिले, दुख  का  बड़ा कारण भी यही है सुख की कामना करना,कोइ भी  कामना करना दुख का कारण है, कामना भी दो प्रकार की होती है !


   सांसारिक भोग और संग्रह की कामना ,दूसरी होती है पारमार्थिक यानी अपने   कल्याण  की कामना,


 सांसारिक भोग और संग्रह क़ी कामना परधर्म है,यह  जो  नष्ट होने वाला है, शरीर मन बुद्धि आदि इसको संतुष्ट करने के लिये जो कामना  करते है वह परधर्म है  क्योकि कितनी भी धन सम्पत्ति ऐशो-आराम की वस्तुए हमारे पास इकट्ठी हो जाय, हमारा लोभ कभी कम नही होता निरन्तर बढ़ता चला जाता है हमे कभी संतुष्टि नहीं मिलती, कभी नुकसान  हो जाएं तो दुख होता  है!


 एक सन्त अपने शिष्य के घर गए  वहा देखा सब उदास थे उनका शिष्य किसी काम से घर से बहार गया उनसे रहा नही गया उन्होने शिष्य की पत्नि से पुछा -क्या बात  सब  परेशान है !
 पत्नि ने  जवाब दिया -इन्हे व्यापार में  घाटा हो  गया इसलीये थोड़े  परेशान है
 संत  ने पूछा -क्या ज्यादा घाटा  हो गया
 पत्नि ने उत्तर दिया -नुकसान भी नहीं हुआ और हो भी गया
 मै कुछ समझा नहीं '-
 गुरूजी बात दरअसल यह है इन्हे एक जगह से दस लाख का नफा होना था मगर वहा से इन्हे पांच लाख का  ही हुआ,यह पांच लाख का  नुकसान मान रहे है. इसलिए दुखी है

 जितना  हम संसार से  अपना सम्बन्ध जोड़ेगे, धन सम्पत्ति को अपना मानेगे उतना ही सुख और दुख के भंवर मे फंसे रहेंगे उसे कितनी भी धन -संपत्ति मिल जाय कभी संतुष्ट नहीं होता ,उसका लोभ बढ़ता ही चला जाता है हमे लगता है जितना हमारे पास धन -समपत्ति ज्यादा होगा उतने  हम सुखी होंगे यह हमारा अज्ञान औऱ दुर्भाग्य है जैसे कोई शराबी नशे मे बेहोश होकर गँदी नाली मे  पड़ा है और कुत्ते उसके ऊपर मूत्र त्याग करके जा रहे रहे है,फिर भी वह अपने को सुखी मानता है। सांसारिक धन सम्पत्ति से अपने को सुखी मानने वाले मनुष्य का सुख समुद्र से उठने वाली लहरो के समान है। यह केवल उसका  अज्ञान है। वे विनाशकारी एवं पतन की  ओर ले जाने वाले  क्षणिक सुख को ही असली सुख मान लेते है जबकि सांसारिक वस्तुओं,धन -संपत्ति आदि मे  सुख है ही नहीं,क्योकि इस सँसार मे जो भी वस्तुए है सब एक न  दिन नष्ट होने  वाली है उसका नाश निश्चित है। यहा तक की यह हमारा शरीर भी एक न एक दिन नष्ट होना है जिसे हम अपना मानते है।  जितना भी हम सांसारिक वस्तुओ की कामना करेँगे उतना लोभ भी बढ़ता चला जाता है हमे कभी संतुष्टि  नही मिल पाती,कामनाए कभी किसी की पूरी नही हुयी,कामनाए उस अग्नि के समान है जितना घी डालोगे उतना ही भड़केगी,हमारे दुःखो का मुल काऱण  हीं हमारी असीमित कामनाये है जब तक हृदय मे इक्छाये है आनन्द की अनुभूति नहीं हो सकती। कामनाये ही हमें उच्च विचारो से गर्त मे ले जाती है जिसके विचार अच्छे नही वह कभी आनन्द को महसूस नहीं कर सकते, जिसके विचार उच्च है  वह कभी दुखी नहीं रह सकता,उसके  ह्रदय मे कामना तो होती  है मगर वह सांसारिक भोग और संग्रह की नहीं होती,परमात्मा  से मिलन की होती है परम आनंद की होती है एक बार आनंद की अनुभूति हो जाय फिर इतना ज्ञान हो जाता है कि सांसारिक कामनाओ में सुख  है ही नही,


   प्रत्येक मनुष्य में two sources होती है good sources and bed sources,सांसारिक भोग पदार्थ व संग्रह की कामना ही सम्पूर्ण पापो का कारण है उस कामना के बढ़ जाने  से ही हमारे अंदर bed sources बढ़ते चले जाते है। जैसे धन  की  कामना अधिक बढ़ने से झूठ कपट,छल, बेईमानी आदि बढ़ जाते है वह यह सोचता रहता है अधिक से अधिक धन कैसे मिले-उसका लोभ बढ़ता ही चला जाता है। फिर वह अनुचित तरीके से धन अर्जित करने की कामना करता है। इससे उसका लोभ ओर बढ़ जाता है,वह धन के लिए अपने सगे- सम्बंधिओ,दोस्तों को भी धोखा दे देता है यहा  तक की वह हत्या करने में भी नहीं हिचकिचाता। इस प्रकार उसमे क्रूरता बढ़ती चली जाती है। उसमे लोभ के साथ-साथ अभिमान भी आ जाता है कि  हमने अपने प्रयास से,बुद्धिमानी से,होशियारी से ,चालाकी से इतना धन -संपत्ति मान  -सम्मान प्राप्त किया है। इतना और प्राप्त कर लेंगे। जैसे -जैसे लोभ बढ़ता चला जाता है उसकी कामनाये भी बढ़ती चली जाती है। उसका चिंतन भी बढ़ता चला जाता है-वह खाते -पीते,भोजन करते हुए,पूजा -पाठ.भजन -जप करते हुए भी धन कैसे बढ़े  चिंतन करता है इतनी संपत्ति और हो जाय इतना धन और बढ़ जाये तो अच्छा रहेगा।मेरा और मेरे बच्चो का भविष्य सुखी हो जायेगा।


 जब  अपने और अपने परिवार  बारे  सोचता है तब वह सांसारिक वस्तुओ की कामना करने लगता है अमुक चीजे हमारे  पास हो तो हम सुख  से रहेंगे एक के बाद एक वह वस्तुओ का संग्रह करता चला जाता है ऐसी कामना करते -करते वह कब बूढ़ा हो  गया उसे पता  ही नहीं चला कि इस सामग्री का वह क्या  करेगा और  यह वस्तुए किस काम  आएगी ? अंत में इसका मालिक कोन होगा ? मरते समय यह धन -संपत्ति  स्वयं  दुःख देगी,इस धन संपत्ति के लोभ के  कारण ही बेटा और बहु से डरना पड़ता है। अंतिम समय उसका कष्ट  पीड़ा में व्यतीत होता है।   मन में अशांति,हलचल आदि कब होते है ? जब  धन -संपत्ति,स्त्री -पुत्र आदि नाशवान चीजो  का सहारा लेते है ये सब चीजे आने -जाने वाली है। इनसे जब तक मोह,ममता  रहेगी,life में सुख -दुःख लगा रहेगा हमे कभी आनंद की अनुभूति नहीं होगी कभी मन शांत नहीं होगा। ये सब चीजे अपना कर्त्तव्य समझ कर करने की है, न कि उनसे ममता मोह में फसना है।


                                  मन की प्रसन्ता कैसे प्राप्त करे
 सांसारिक वस्तु ,सगे सम्बन्धी अन्य व्यक्ति,अनुकूल -प्रतिकूल परिस्थिति,समय,घटना आदि को  लेकर मन में राग -द्वेष  पैदा न होने दे।
 मन को सदा क्षमा, दया उदारता आदि भावो से परिपूर्ण रखे।
 अपने स्वार्थ और अभिमान  को लेकर किसी से पक्षपात  न करे।
 मन में सदा सबके हित का भाव रखे।
  सांसारिक कोई भी कार्य कर रहे हो मन में  प्रत्येक क्षण  परमात्मा का स्मरण करते रहे। उनके किसी भी नाम का  जप करते रहे।
ह्रदय में हिंसा,क्रोध ,क्रूरता आदि  भावो के  न रहने से,कोई हमारे साथ कैसा भी व्यवहार करे,हमारे अंदर राग -द्वेष पैदा न  होना।
प्रत्येक परिस्थिति में सिर्फ परमात्मा का सहारा होना ,उसका ही चिंतन करना, कोई भी कार्य उसका  समझ कर करना,जो कुछ भी हमारे पास है वह सब उसका ही समझना।
   अपने को सदा प्राणी मात्र  का सेवक माने।
मन प्रसन्न रहता है तो आनंद की अनुभूति अपने आप होने लगती। bed sources का स्थान good sources ले लेता है और life colourful हो जाती है।

Thursday, 15 June 2017

पैसा कमाने का आसान तरीका -सेवाभाव

                            

                    


सब पैसा चाहते है किसे पैसा नही चाहिए, पैसे के बिना इस संसार मे कुछ है भी नही,

धन दौलत इकटठी की जाए , खुब पैसा हमारे पास हो ।

यह एक अच्छी सोच है पैसो से ही आप स्वयं व आपका परिवार मनचाही जिन्दगी जी सकता है आपके जीवान की

 आवश्यकता की वस्तुए पैसे से ही खरीदी जा सकती है पैसो से ही आप गरीब व जरुरतमंद लोगो की मदद कर सकते 

हो अगर आपके पास पैसा है तभी आप अपने परिवार के साथ साल मे एक या दो बार पर्यटक स्थल पर घूमने जा सकते

 हो । धन एक वह साधन है जिसके माध्यम से जीवन का भरपूर आन्नद उठा सकते हो ।

  इस संसार मे परमात्मा द्वारा दिये गये साधनो मे से एक धन सबसे महत्वपूर्ण साधन है ।

 अक्सर हमे धार्मिक गुरुओ द्वारा यह सुनने को मिलता है धन समपत्ति सब माया है सब बेकार है एक दिन छूट ही

 जाना है फिर इसके पीछे क्यो भागे । कोई भी आश्रम मन्दिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारा आदि सब माया से ही बनते है 

सतसंग पूजा बीना माया के नही होता । यह जीवन चलाने के लिए भी माया की आवश्यकता होती है बिना माया के इस

 संसार मे कुछ भी संभव नही ।

  जो लोग यह कहते है हमे पैसा नही चाहिए

 हम तो गरीब है

 पैसो का क्या करना है ?

उपरोक्त शब्द वही बोलते है जिनके अन्दर आगे बढने की ललक नही होती आलसी होते है हमेशा गरीबी का रोना रोते 

रहते है ।

या उन्हे पैसा कमाने का मौका नही मिला । पैसा तो कमाना चाहते है मगर पैसा कमाने का तरीका नही जानते ।

 सच्चाई यही है पैसा सब चाहते है मगर अधिकांशत पैसा उल्टे ढंग से कमाते है ।

पैसा कमाने के लिर पैसो का पेड़ बोना पड़ता है ।

सेवाभाव पैसो का बीज है आप अपने अन्दर सेवाभाव लाइये पैसो का पेड़ लग जायेगा ।

मगर अधिकांशतः लोगो का लक्ष्य पहले पैसा होता है और वे पैसो के दिवाने हो जाते है एसे लोगो के पास पैसा कम

 आता है पूरी जिन्दगी पैसा पैसा करते हुए बीत जाती है ।

कुछ लोगो के पास पैसा आ भी जाता है तो वे पैसो के इतने दीवाने हो जाते है वे अपनी आवश्यकता के लिए भी पैसा

खर्च नही कर पाते । सिर्फ संग्रह करते चले जाते है ।

 धन परमात्मा का वह साधन है जिसके द्वारा आप अपनी जिन्दगी आन्नद से गुजार सकते हो और दूसरो की मदद भी

 कर सकते हो देश विदेश का भ्रमण भी कर सकते हो आप अपने परिवार समाज देश की तरक्की मे सहयोग कर सकते 

हो ।

पैसा कमाने का लक्ष्य एक अच्छी सोच है मगर अपने अन्दर सेवाभाव विकसित कीजिए पैसो का बीज ही सेवाभाव है ।

 पहले  सेवाभाव यह पैसा कमाने का सीधा सरल रास्ता है।

 पहले पैसा यह पैसा कमाने का उल्टा रास्ता है आप किसी रेस्त्रा मे खाना खाने जाते है वहा वेटर आपकी सेवा मे 

उपस्थित होता है  मेज पर कपड़ा मारता है आपको पानी देता है उसके बाद आपसे आर्डर लेता है जितना समय खाना

 आन्रे मे लगता है आपको जलजीरा पेश करता है जलजीरे के गिलास ले जाता है मेज पर कपड़ा मारता है । फिर खाना

 लगाता है । बराबर आपकी सेवा मे उपस्थित रहता है ।

 वह हमेशा अच्छी टिप लेता रहेगा ।

          पहले सेवा फिर मेवा

एक बार मै और मेरी पत्नी लेडीज कपड़ो के शोरुम पर गये । सेल्संमैन ने शूट दिखाने शुरु किए शूट सब अच्छे थे मगर

 हमारे बजत से बहार थे वह काफी महंगा शोरुम था हमे पसन्द आने के बावजूद भी हम नापसन्द      करते रहे । वह

 मुस्कराते हुए एक के बाद एक शूट दिखाता रहा मगर सब हमारे बजट से बहार थे ।

अन्त मे हमने उससे कहा हमे पसन्द नही है हम उठकर जाने लगे ।

 तब सेल्समैन ने मुस्कराकर कहा –“कोई बात नही सर अगली बार आइये आपकी पसन्द के मुताबिक शूट अवश्य मिलेगा

 मै क्षमा चाहता हू मै आपकी पसन्द का शूट नही दिखा पाया ।“

 उसके यह शब्द मेरे दिल मे उतर गये उस सेल्समैन ने मेरे दिल मे जगह बना ली ।

 उसका मेरे ऊपर इतना प्रभाव पड़ा अगली बार से मै उसी के यहा से शूट खरीदता हू ।

कुछ सेल्समैन एसे होते है कुछ नही बल्कि ज्यादातर,

आपको समान दिखाते है आपको पसन्द न आने पर एक बुरा सा मुंह बनाते है कुछ तो अपशब्द भी बोल देते है ।

 जाने कहा कहा से परेशान करने आ जाते है

 न तो अपने समय का ख्याल है न दूस्ररे का

एसे लोगो की दूकान पर कोई मजबूरी मे ही जायेगा एसे लोगो का मकसद सिर्फ पैसा होता है मगर इनका पैसा कमाने

 का तरीका हमेशा उल्टा होता है एसे लोग कभी स्वयं भी खुश नही रहते । वे चिड़चिड़े और झगड़ालु प्रवृति के होते है

 जितनी उनमे क्षमता होती है उससे काफी कम ये पैसा अर्जित करते है इनके दिमाग मे हमेशा पैसा ही चलता रहता है

 एसे लोग पैसो के साधन का मजा नही ले पाते बल्कि पैसा ही इनके लिए सब कुछ हो जाता है ।

दो दोस्तो का एक ही कम्पनी मे नौकरी लगी दोनो की एक ही पोस्ट थी समान वेतन था ।

अगले पाँच सालो मे मि अ का वेतन मि ब के वेतन से पाँच गुना ज्यादा हो गया ।

 मि अ ने कम्पनी को अपनी कम्पनी समझ कर काम किया हर वह काम किया जिससे कम्पनी को फायदा पहुचे और

 उसकी बढोतरी हो ।

 जबकी मि ब ने उतना ही काम किया जितना उनका काम था काम किया बात खत्म हो गयी पैसे तो इतने ही मिलने

 है 

मि अ के दिमाग मे सिर्फ एक ही बात चलती थी किस तरह से कम्पनी को आगे बढाया जाए अपना काम तो वे करते

 ही थे वरन यह भी सोचते थे कम्पनी को आगे कैसे बढाया जाए ।

 इसलिए वह नया काम भी सीखते गये । कम्पनी को भी फायदा हुआ और उन्हे भी ।

 मि ब जैसे लोग जिन्हे सिर्फ पैसो से मतलब होता है जीवन मे ज्यादा तरक्की नही कर पाते है वह पाँच साल बाद भी 

वही के वही रहे आगे भी एसे लोगो की तरक्की नही होने वाली ।

 मि अ जैसे लोग अपने सेवाभाव वाले भाव के कारण काफी ऊचाईयो तक पहुँचते है ।

 सेवाभाव ही ज्यादा पैसा कमाने का बीज है अगर आप जिन्दगी मे आगे बढ़ना चाहते है तो अपने अन्दर सेवाभाव पैदा

 कीजिए ।

 दूसरो की हमेशा मदद करो

 अपने अन्दर उत्साह पैदा करो


 रुको मत जीवन मे आगे बढो ।

Wednesday, 17 May 2017

How To Be Successful In Life


           


'महंगाई बहुत है'   
'महंगाई के कारण पुरे महीने का खर्चा चलाना मुश्किल हो रहा है'
'हे भगवान आज के इस महंगाई के दौर मे बच्चो को शिक्षित करना कितना मुश्किल होता जा रहा है'
उपरोक्त वाक्य हमे अक्सर सुनने को मिलते है
कभी आपने सोचा है ये कौन लोग बोलते है ?
गरीबी की रेखा मे रहने वाले लोग,
उससे थोड़ा ऊपर जिसे हम औसत कह सकते है
 निम्न मध्यवर्गीय कह सकते है
 ये सब अपने जीवन मे असफल लोग है जो सिर्फ अपना जीवन काट रहे है और किसी न किसी से चोट खाये होते है या कुछ करना तो चाहते थे मगर असफल हो गये, गिर पड़े,
उठे और दुसरी दिशा मे घिसटते हुए चल दिये यही वह लोग है जो हमेशा रोते रहते है
महंगाई बहुत है
कुछ ही चन्द लोग एसे है जिन्हे कभी महंगाई नही लगती अपनी आवश्यकता के अनुसार बड़े मजे से खर्चा करते है सही मे अगर जिन्दगी का मजा ले रहे है तो यही वह चन्द लोग है जिन्हे  हम सफल लोगो की श्रेणी मे रख सकते है ।
सफल व्यक्ति उसे कहा जा सकता है जिसे उसकी आवश्यकता की वस्तुए सस्ती लगने लगे ।
तीन तरह के लोग इस दुनिया मे पाये जाते है
गरीब, औसत और सफल
गरीब व्यक्ति इस लिए गरीब है वह अपने को गरीब मानता है वह हारा हुआ इन्सान है उसने गरीबी को अपनी तकदीर मान लिया है कभी उसने अपने को ऊपर उठने का प्रयास ही नही किया और सबसे ज्यादा शारीरिक मेहनत भी यही करता है । दिन मे कई बार यह अपने को याद दिलाता है वह गरीब है वह हमेशा परेशान रहता है तनाव मे रहता है उससे अगर आप बात करे तो आपको वह इतने दुख गिना देता है
‘मै जीवन मे बहुत कुछ कर सकता था मगर मुझे उसने धोखा दे दिया’
‘मेरी तो बीमारी ही जाने का नाम नही लेती’
आदि न जाने कितने दुखो के भवर मे फंसा है
इन सब तनाव को कम करने के लिए वह शराब का सहारा लेता है गरीब आदमी सबसे ज्यादा शराब पीता है और बच्चे पैदा करता है इससे वह कुछ समय के लिए अपने दुख भूल जाता है ।
औसत आदमी जीवन मे बहुत कुछ करना चाहता है मगर असफल हुआ,
गिरकर किसी तरह से उठा मगर फिर से न गिर जाऊ संभलकर चलने लगा जो कुछ मेरे पास है वह खो न जाए या कम न हो जाए उसकी सारी ऊर्जा उसमे ही लगी रहती है वह हमेशा इसी गुणा भाग मे लगा रहता है किस तरह खर्चा कम हो या कहा से पैसे बचाए जा सकते है ।
जबकि सफल व्यक्ति यह नही सोचता खर्चा कैसे कम हो बल्कि वह चिन्तन करता है कैसे अपनी आय बढाई जाए ।
 अब  बात करते है उन चन्द सफल लोगो की
सफल लोगो मे एक बात देखने मे आती है ये प्रत्येक वर्ग का प्रतिनिधित्व करते है चाहे उधोगपति हो बड़े व्यापारी हो मन्त्री हो खिलाड़ी हो या किसी भी क्षेत्र मे सफलता हासिल की हो इसमे आपको गरीब निम्न उच्च मध्यमवर्गीय अमीर प्रत्येक वर्ग का प्रतिनिधित्व मिलेगा ।
सफल, औसत और गरीबी की दलदल मे फंसे लोगो मे क्या अन्तर है ? जो चन्द सफल लोग है ये भी असफल हुए मगर हारे नही अपनी असफलता से बहुत कुछ सीखा ।
गिरे उठे और फिर दौगने जोश के साथ चल दिए और अपने गिरने के कारणो की समिक्षा की और आगे बढे
फिर गिरे
 उठे
फिर चौगने जोश के साथ अपने गिरने के कारणो की समिक्षा की और आगे बढे । अपनी असफलता से निराश नही हुए उससे सिखते हुए आगे बढते गये ।
 जितने भी सफल लोग है चाहे खिलाड़ी हो एकटर हो उधोगपति आदि  सभी कितनी बार असफल हुए है उनमे और औसत लोगो मे सिर्फ एक ही फर्क रहा है औसत असफल होने के बाद उठ नही पाये,
 उठे भी तो अपनी दिशा बदल ली सफल लोग असफलता से निराश नही हुए बल्कि उसे सिखने का माध्यम बनाया असफलता ही उनकी सफलता की प्रेरणा बनी ।
 जब किसी देश की क्रिकेट टीम मैच हारती है तो उसके हारने के कारणो की समीक्षा की जाती है अब तो टीम कोच मैच की विडियो बनवाते है और हारने के कारणो को खिलाड़ियो के साथ देखते है और उसकी समीक्षा करते है जो गलतियॉ उस मैच मे की थी अगले मैच मे उन गलतियो को सुधारते हुए पुरे जोश के साथ मैच खेलते है ।
 असफलता सिर्फ सिखने के लिए होती है जो सिखता है वही हार को जीत मे बदलता है ।
हार को जीत मे बदलने वाला ही सफलता के शिखर पर पहुचता है अगर हमारे अन्दर सिखने का जज्बा है तो असफलता भी हमारे लिए फायदे का सौदा हो सकती है
 मगर यह मनुष्य भी अजीब है जब यह जीतता है तो उसका श्रेय स्वय लेना चाहता है लोगो से सुनना चाहता है
मगर इसके विपरीत जब असफल होता है तो वह दोष दूसरो पर मढ़ना चाहता है ।
उसने मेरे साथ एसा किया इसलिये मुझे नुकसान उठाना पढा या उसके कारण आगे नही बढ पाया ।
 सफल व्यक्ति कभी दूसरो पर आरोप नही लगाता बल्कि अपनी प्रत्येक
असफलता को सकरात्मक दृष्टि से देखता है और उससे कुछ न कुछ अवश्य सिखता है ।
 औसत असफल व्यक्ति हमेशा अपनी कमिया छिपाता है और अपनी असफलता का दोष दूसरो पर मढता है ।
  ‘मै यह करना चाहता था मगर मेरे मां –बाप ने नही करने दिया ‘
इस तरह के डायलॉग हमे अक्सर सुनने को मिलते है
एसे लोगो से एक सवाल पूछे –
क्या सारे काम आपने मां –बाप की मर्जी से किये है फिल्मे देखना मोबाइल पर व्हाटसैप फेसबुक पर घंटो बैठे रहना यू टयूब पर विडियो देखना दोस्तो के साथ मस्ती करना , अगर यह सब काम आपने अपने मां –बाप की मर्जी के खिलाफ किए है
फिर वह एक काम जिसमे आपको लगता है आप बहुत कुछ कर सकते है मां –बाप की मर्जी के विरुध क्यो नही कर सकते ।
 यह सब बहानेबाजी है डर हमारे अपने अन्दर होता है हम अपने कमफर्ट जोन को छोड़ना नही चाहते और अपनी असफलता का आरोप दूसरो पर लगाते रहते है
सफल और असफल लोगो मे सबसे बड़ा फर्क यही होता है सफल लोग अपनी असफलता की जिम्म्रेदारी स्वयं लेते है और उससे कुछ  सिखते है और फिर पूरे जोश से आगे बढते है । असफल लोग असफल होने पर दोष दूसरो पर मढते है उस असफलता से सिखना तो दूर आगे बढने का होसला भी खो देते है ।
 असफलता ही सफलता की सीढी होती है जितने भी सफल लोग हुए है कितनी बार असफल हुए मगर असफलता से निराश नही हुए बल्कि उस असफलता को आगे बढने का माध्यम बनाया ।

थोमस एडिसन, kfc के मालिक कर्नल सैडर्स, निरमा कम्पनी के मालिक कर्सन भाई पटेल, सन्दीप महेश्वरी आदि एसे नाम है जो बार बार असफल हुए मगर हिम्मत नही हारी और एक दिन अपनी नजरो मे दुनिया की नजरो मे सफल कहलाए ।   

Thursday, 20 April 2017

भक्ति जितना मनुष्य को भटकाती है, उतना और कोई चीज नहीं भटकाती है।

मैंने सुना है एक गांव में एक शराबी ने एक मिठाई की दुकान से लडडू खरीदे। रुपया दिया। आठ आने उसे वापस मिलने थे। लेकिन दुकानदार ने कहा क्षमा करें, मेरे पास छुट्टे नहीं हैं। कल सुबह आ जाना!
शराबी शराब में था, उसने सोचा कि यह तो झंझट की बात है। सुबह बदल जाए! तख्ती बदल ले। अपना नाम बदल ले। शराबी को हजार तरह की कुशकाएं उठने लगी—कि आठ आने मेरे गए। उसने सोचा कि कोई ऐसा विज्ञान मुझे बना लेना चाहिए कि यह बदल न सके। उसने चारों तरफ देखा। देखा एक सांड बैठा है। सामने ही बैठा है दुकान के। उसने कहा ठीक है। जहां सांड बैठा है.......!
सुबह जब आया वापस सांड का कोई पक्का थोड़े ही है कि वह मिठाई की दुकान के सामने ही बैठा रहेगा। सांड कोई आदमियों जैसे थोड़े ही हैं कि जहां बैठ गए, बैठ गए। सांड तो मुक्त हैं। इसलिए तो शिवजी ने उन्हें चुना है। वे चले गए थे। वे बैठे थे एक नाई की दुकान के सामने!
वह आदमी तो एकदम घुस गया नाई की दुकान में। और गरदन पकड़ ली नाई की। और कहा हद्द हो गयी! आठ आने के पीछे तख्ती बदल ली? धंधा बदल लिया? जात बदल ली? आठ आने के पीछे! मगर तुम मुझे धोखा न दे सकोगे। वह सांड बैठा है!
तुम्हारे जिंदगी के नक्शे बस, सब ऐसे ही हैं। जिंदगी रोज बदल जाती है, तुम्हारे नक्शा पीछे पड जाते हैं; उनका कोई अर्थ नहीं है। तुम्हारे शास्त्र सब ऐसे हैं, क्योंकि जब बनते हैं, तब जिंदगी एक होती है। जब तक बन पाते हैं, तब तक जिंदगी दूसरी हो जाती है।
अब आज तुम वेद को बैठे पढ़ते रहो, या आज तुम बैठकर गीता को पढ़ते रहो। जिंदगी बहुत बदल गयी, गंगा में बहुत जल बह गया है।
इसीलिए मैं जब बुद्ध की व्याख्या करता हूं तो तुम खयाल कर लेना। मुझे बुद्ध की उतनी चिंता नहीं है। क्योंकि ढाई हजार साल में जिंदगी बहुत बदल गयी। मुझे तुम्हारी चिंता है। मैं जब बुद्ध की व्याख्या करता हूं, तो मुझे बुद्ध की उतनी फिकर नहीं है। मेरी निष्ठा बुद्ध के प्रति उतनी नहीं है, जितनी आज के इस क्षण के प्रति है। इस क्षण के अनुकूल नक्‍शे को बदलता हूं।
तुम्हारे और व्याख्याकार जो हैं, नक्‍शे के प्रति उनकी निष्ठा भारी है। वे कहते हैं. जिंदगी जाए भाड़ में। समय की धारा का कुछ भी हो। हम तो पक्का जो किताब में लिखा है, उसी को मानते हैं। चाहे किताब अब बिलकुल ही गलत हो गयी हो! सभी सत्य सामयिक होते हैं। और जो शाश्वत सत्य है, उसको शब्द में कहने का कोई उपाय नहीं है। उसे कभी किसी ने कहा नहीं। जो कहा गया है, वह सामयिक है। और सभी सत्य, जब सामयिक होते हैं, तो समय के बदलने पर बदल जाने चाहिए।
सत्य तुम्हारे बदलते नहीं, पत्थरों की तरह जड़ हैं। और जिंदगी फूलों की तरह बह रही है। उनमें कभी तालमेल नहीं रह जाता है।
तो तुम्हारे तथाकथित सत्य ही तुम्हारे सत्य तक पहुंचने में बाधा बन जाते हैं। तुम्हारे शास्त्र ही अवरोध हो जाते हैं। अतीत की अंध — भक्ति जितना मनुष्य को भटकाती है, उतना और कोई चीज नहीं भटकाती है।
नदी की तरह रहो। नक्‍शे को ले चलने की कोई जरूरत नहीं है। और जब नदियां तक पहुंच जाती हैं सागर तक, तो तुम क्यों न पहुंच पाओगे? तुम भी चैतन्य की धारा हो। तुम चैतन्य का सागर खोजने निकले हो। इस जगत में नदियों तक को मिल जाता है मार्ग? तो तुम्हारी चैतन्य— धारा को न मिलेगा? कुछ तो भरोसा करो। इस भरोसे का नाम श्रद्धा है।
नदी अनजाने सागर की खोज कर रही है —अनजाने। नदी को कुछ पता नहीं, कहां जा रही है? क्यों जा रही है? मगर टटोल रही है सागर को। विराट की खोज में निकली है। कोई नक्शे भी पास नहीं है। कोई शास्त्र भी पास नहीं है। कोई वेद, कुरान, बाइबिल भी पास नहीं है। अनंत की खोज पर चली है बिना नक्शे के। कोई गुरु नहीं। किसी की अनुगामी नहीं। टटोल रही है अपने से। और पहुंच जाती है।
सभी नदियां पहुंच जाती हैं —यह तुमने देखा! छोटी नदियां पहुंच जाती हैं। बडी नदियां पहुंच जाती हैं। नदी—नाले सब पहुंच जाते हैं। सब सागर पहुंच जाते हैं। अगर अपनी सामर्थ्य से नहीं पहुंच सकते, तो छोटे नाले बड़े नालों में गिर जाते हैं। बड़े नाले नदियों में गिर जाते हैं। नदियां बड़ी नदियों में गिर जाती हैं। मगर सागर तक सब पहुंच जाते हैं।
तुम खोजते ही रहो, तो परमात्मा तक पहुंच जाओगे। और नक्‍शो की कोई जरूरत नहीं है। हिंदू मुसलमान, ईसाई—नक्‍शे की कोई जरूरत नहीं है। खोज की त्वरा चाहिए। खोज की तीव्रता चाहिए। खोज की सघनता चाहिए। नक्‍शे नहीं काम आते, खोज की सघनता काम आती है।
इस भेद को समझ लेना। नदी को नक्शा पकड़ा दो, इससे कुछ अर्थ नहीं होगा। सिर्फ नदी में जलधार होना चाहिए, ऊर्जा होनी चाहिए। बस, पर्याप्त है। उसी ऊर्जा के बल नदी खोजती है।
जिन्होंने सत्य को पाया है, उन्होंने भी नक्‍शो के सहारे नहीं पाया है। क्योंकि इस परिवर्तनशील जगत में नक्शे बन ही नहीं सकते। तुम जिस जगत का नक्‍शे बनाते हो, जब तक नक्शा बनता है,  तब तक जगत बदल जाता है। यहां नक्शे हो नहीं सकते। जीवन परिवर्तन है, तो नक्‍शे होंगे कैसे?
🎉ओशो🎉

Sunday, 16 April 2017

Ego is always in competition with others..

Man’s ego is the source of all his problems, all the wars, all the conflicts, all the jealousies, fear,depression.
Feeling oneself as a failure, continuously comparing with others makes everybody hurt– and hurt tremendously, because you can’t have everything.
Somebody is more beautiful than you,that hurts; somebody has more money that you, that hurts; somebody is more knowledgeable thanyou, that hurts.
Millions of things are there to hurt you, but you don’t know, it is not those things that are hurting you, because they don’t hurt me.
They are hurting you because of your ego.
Ego is constantly trembling with fear, knowing perfectly well that it is an artifact, an artificial device created by the society to keep you running, chasing shadows.
The politicians are happy, they want
you to go on running. This game of the ego, reaching higher and higher, is politics. The priest is happy, you go on asking for his blessings.
Osho

सुख दुख होते ही नही


आस्कर वाइल्ड की एक छोटी सी कहानी है। एक आदमी मरा। जिंदगी में लोग जो करना चाहते हैं, सब करके मरा। बड़ा पद, बहुत धन, सुंदर स्त्रियां--जो भी मनुष्य की आकांक्षाएं हैं--सभी को पूरी करके मरा।
परमात्मा के सामने न्यायालय में उपस्थित किया गया। स्वभावतः परमात्मा नाराज था। उसने कहा, बहुत पाप किए तुमने। तुम्हारे पास अपने किए गए पापों के लिए कोई उत्तर है? उस आदमी ने कहा, जो मैं करना चाहता था वह मैंने किया और उत्तरदायी मैं किसी के प्रति नहीं हूं। परमात्मा थोड़ा चौंका। उसने कहा, तुम हिंसा किए, हत्या किए, खून किए? उस आदमी ने कहा, निश्चित ही। तुमने धन के लिए लोगों की जानें लीं? तुमने व्यभिचार किया, बलात्कार किया? उस आदमी ने कहा, निश्चित ही। लेकिन उस आदमी के चेहरे पर शिकन भी न थी। न अपराध का कोई भाव था। न कोई चिंता थी। परमात्मा थोड़ा बेचैन होने लगा। अपराधी बहुत आए थे, यह कुछ नए ही ढंग का आदमी था। परमात्मा ने कहा, जानते हो, तुम्हारा यह बार-बार कहना कि हां, निश्चित ही, मैं तुम्हें नर्क भेज दूंगा! उस आदमी ने कहा, तुम भेज न सकोगे। क्योंकि मैं जहां भी रहा, नर्क में ही रहा। अब तुम मुझे कहां भेजोगे? मैंने नर्क के सिवाय कभी कुछ जाना ही नहीं, अब तुम हमें और कहां भेजोगे जहां नर्क हो सकता है?
अब तो परमात्मा के चेहरे पर पसीना झलक आया। कुछ सूझा न उसे। अब तक के सारे निर्णय, अब तक की लंबी सनातन से चली आती हुई घटनाएं, कोई काम न पड़ीं। कोई फाइल सार्थक न मालूम हुई। उसने कहा--घबड़ाहट में--कि फिर मैं तुम्हें स्वर्ग भेज दूंगा। उस आदमी ने कहा, यह भी न हो सकेगा। परमात्मा ने कहा, तुम आखिर हो कौन? मेरे ऊपर कौन है, जो मुझे रोक सके तुम्हें स्वर्ग भेजने से! उस आदमी ने कहा, मैं हूं। क्योंकि मैं सुख की कल्पना ही नहीं कर सकता और हर सुख को दुख में बदल लेने में मैं इतना निष्णात हो गया हूं। तुम मुझे स्वर्ग न भेज सकोगे। तुम भेजोगे, मैं नर्क बना लूंगा। मैंने सुख का स्वप्न भी नहीं देखा। सुख की कल्पना भी नहीं कर सकता हूं, तुम मुझे स्वर्ग कैसे भेजोगे?
और कहते हैं, मामला वहीं अटका है। परमात्मा सोच रहा है, इस आदमी को कहां भेजें? नर्क भेज नहीं सकता, क्योंकि नर्क में वह रहा ही है। स्वर्ग भेज नहीं सकता, क्योंकि स्वर्ग भेजने का उपाय नहीं है।
इस कहानी को ध्यानपूर्वक समझने की कोशिश करना। यह किसी और आदमी की कहानी नहीं, सभी आदमियों की कहानी है। तुम वहीं भेजे जा सकते हो, जहां तुम जाना चाहते हो। और अगर सुख की तुम्हारे जीवन में स्वप्न की भी क्षमता खो गयी है, तो तुम्हें कोई भी स्वर्ग नहीं दे सकता। स्वर्ग कोई दान नहीं। स्वर्ग किसी के अनुग्रह से न मिलेगा। अर्जित करना होगा।
सुख भी सीखना पड़ता है। सुख का स्वाद भी सीखना पड़ता है। और अगर तुम स्वाद को न जानो, तो सुख पड़ा रहेगा तुम्हारी थाली में, तुम उसे चख न सकोगे, तुम उसे अपना खून-मांस-मज्जा न बना सकोगे, वह तुम्हारी रक्त की धार में न बह सकेगा, वह तुम्हारे जीवन की रसधार न बनेगी। और दुख भी तुम्हारा जीवन का ढंग है। तुम्हारे हाथ में जो पड़ जाता है, तुम दुख में बदल देते हो।
जो देखते हैं दूर और गहरा, उनसे अगर पूछो, जागे हुओं से पूछो, तो वे कहेंगे, सुख और दुख होते ही नहीं। तुम्हीं हो। वही घटना सुख बन जाती है किसी के हाथ में, वही घटना दुख बन जाती है। कोई उसी घटना को दुर्भाग्य बना लेता है, कोई उसी को सौभाग्य बना लेता है। सारी बात तुम पर निर्भर है। तुम आत्यंतिक निर्णायक हो। परमात्मा भी तुम्हें स्वर्ग नहीं भेज सकता, नर्क नहीं भेज सकता। तुम जहां होना चाहते हो, वहीं हो और वहीं रहोगे। तुम्हारी स्वतंत्रता अंतिम है। तुम अपने मालिक हो।
ओशो

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· . प्रेम आत्मा का भोजन है।

     ·    ·  ....... प्रेम आत्मा का भोजन है। प्रेम आत्मा में छिपी परमात्मा की ऊर्जा है। प्रेम आत्मा में निहित परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग ...