go to your devotee?”
The Great Secret
---- Osho
मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन अपने बाल बनवाने एक नाई की दूकान पर गया है। दाढ़ी पर साबुन लगा दी गई है, गले में कपड़ा बांध दिया गया है--और नाई बिलकुल तैयार ही है काम शुरू करने को कि एक लड़का भागा हुआ आया और उसने कहा--"शेख, तुम्हारे घर में आग लगी है।'
नसरुद्दीन ने कपड़ा फेंका, भूल गया अपना कोट उठाना भी, चेहरे पर लगी हुई साबुन, और उस लड़के के पीछे भागा घबड़ाकर। लेकिन पचास कदम के बाद अचानक ठहर गया, और कहा कि "मैं भी कैसा पागल हूं! क्योंकि पहले तो मेरा नाम शेख नहीं, मेरा नाम मुल्ला नसरुद्दीन है; और दूसरा, मेरा कोई मकान नहीं जिसमें आग लग जाये!'
ऐसे क्षण आपके जीवन में भी हैं। आपको भी न तो अपने नाम का पता है और न अपने घर का पता है। न तो आपको पता है कि आप कौन हैं और न आपको पता है कि आप कहां से आते हैं और कहां जाते हैं। न आप अपने मूल स्रोत से परिचित हैं और न अपने अंतिम पड़ाव से और नाम जो आप जानते हैं कि आपका है, वह बिलकुल काम चलाऊ है, दिया हुआ है।
राम की जगह कृष्ण भी दिया जाता, तो भी चल जाता काम। कृष्ण की जगह मोहम्मद दिया जाता, तो भी चल जाता काम। नाम दिया हुआ है, नाम कोई अस्तित्व नहीं है। लेकिन इस झूठे नाम को हम मानकर जी लेते हैं कि मैं हूं। और एक घर बना लेते हैं, जो कि घर नहीं है। क्योंकि जो छूट जाये, उसे घर कहना व्यर्थ है। और जिसे बनाना पड़े, वह मिटेगा भी। उस घर की तलाश ही धर्म की खोज है, जो हमारा बनाया हुआ नहीं है और जो मिटेगा भी नहीं। और जब तक हम उस घर में प्रविष्ट न हो जायें--जिसे महावीर "मोक्ष' कहते हैं; जिसे शंकर "ब्रह्म' कहते हैं; जिसे जीसस ने "किंगडम आफ गाड' कहा है--जब तक उस घर में हम प्रविष्ट न हो जायें तब तक जीवन एक बेचैनी और एक दुख की एक यात्रा रहेगी।
-ओशो
महावीर वाणी (भाग--2)- प्रवचन--11
मैंने सुना है कि एक सूफी फकीर अपने एक शिष्य के साथ हज की यात्रा को गया। हजारों मील से पैदल चल कर वे आ रहे थे। मरुस्थल में मार्ग खो गया। बड़ी प्यास लगी। किसी तरह खोज कर एक छोटा सा झरना मिल गया। बड़े प्रसन्न हुए। न केवल झरना मिला, बल्कि झरने के पास ही पड़ा एक पात्र भी मिल गया, क्योंकि उनके पास पात्र भी न था। उनके आनंद का कोई ठिकाना न रहा।
उन्होंने उस पात्र में झरने का पानी भरा, लेकिन जब पीने गए तो वह इतना तिक्त और कड़वा था, जहरीला था, कि घबड़ा गए कि यह तो मरने की बात हो जाएगी। यह तो झरना जहर का है।
उस झरने को तो छोड़ा, दूसरे झरने की तलाश में निकले, लेकिन पात्र को साथ ले लिया। दूसरे झरने पर जाकर पानी पीया, वह भी जहरीला था। अब तो बहुत घबड़ा गए कि मौत निश्चित है। जल सामने है, पी नहीं सकते। कंठ सूख रहा है।
तीसरे झरने की तलाश में गए, वह भी मिल गया; लेकिन पानी पीया तो वह भी कड़वा था। पर तीसरे झरने पर एक और आदमी, एक फकीर बैठा था। उससे उन्होंने कहा कि हम समझते नहीं कि यह मामला क्या है, सब झरने कड़वे हैं!
उस फकीर ने गौर से देखा उन्हें और कहा कि झरने तो कड़वे नहीं हैं, जरूर तुम्हारे पात्र में कुछ खराबी होगी। क्योंकि मैं तो इन्हीं झरनों पर जी रहा हूं। तुम झरने से सीधा पानी पीओ, पात्र में मत भरो।
सीधा पानी पीया तो ऐसा मीठा पानी कभी पीया ही न था। वह पात्र गंदा था। वह पात्र जहरीला था।
तो जिस आकांक्षा के पात्र में तुमने सारे संसार के जहर भोगे हैं, उसी आकांक्षा के पात्र में परमात्मा को भी डाल लोगे, वह भी कड़वा हो जाएगा। इसीलिए तो तुम्हारी परमात्मा की आकांक्षा भी दुख ही देती है, सुख कहां देती है!
सांसारिक का गणित कम से कम सीधा-साफ-सुथरा है: पद चाहिए, धन चाहिए, यश चाहिए; ठीक है; खाओ-पीओ, मौज करो। तुम उसे थोड़ा कभी-कभी मुस्कुराते भी देख लोगे, हंसते भी देख लोगे।
धार्मिक आदमी की हालत तो बहुत ही खस्ता है। उसके हाल तो बड़े बुरे हैं। उसको धन भी चाहिए, पद भी चाहिए, यश भी चाहिए, परमात्मा भी चाहिए, ध्यान भी चाहिए, शांति भी चाहिए। उसकी हालत ऐसी है जैसे एक ही बैलगाड़ी में दोनों तरफ बैल जुते हों।
अस्थिपंजर बैलगाड़ी के डगमगा जाएंगे, दोनों तरफ बैल खींच रहे हैं। यात्रा तो हो ही नहीं सकती।
-ओशो
सबै सयाने एक मत- प्रवचन-06
सुना है मैंने, एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन अपने घर के बाहर बैठा है। और गांव का जो मौलवी है, वह मस्जिद से नमाज पढ़कर लौट रहा है। अचानक बरसा आ गई, तो वह तेजी से भागा। मुल्ला ने कहा कि ठहरो! शर्म नहीं आती, धार्मिक आदमी होकर और भागते हो? वह मौलवी भी थोड़ा घबड़ाया कि धार्मिक आदमी होने से। भागने का क्या लेना—देना! उसने कहा, क्या मतलब? मुल्ला ने कहा, परमात्मा पानी बरसा रहा है और तुम भागकर परमात्मा का अपमान कर रहे हो? किसका पानी है यह? यह जल किसका है?
मौलवी भी डर गया, और अपनी इज्जत की रक्षा के लिए और पड़ोसियों को पता न चल जाए कि परमात्मा के पानी का अपमान हुआ; वह आहिस्ता—आहिस्ता घर पहुंचा, तरबतर पानी में। सर्दी पकड़ गई, बुखार आ गया, निमोनिया हो गया।
तीन दिन बाद वह अपनी खिड़की में बैठा है अपनी दुलाई ओढ़े हुए। देखा कि नसरुद्दीन बाजार से लौट रहा है। पानी की थोड़ी—सी बूंदें आईं। नसरुद्दीन भागा। उस मौलवी ने चिल्लाकर कहा कि ठहर नसरुद्दीन! भगवान का अपमान कर रहा है? नसरुद्दीन ने कहा कि नहीं; भगवान का पानी गिर रहा है, कहीं मेरा पैर उस पर न पड़ जाए और अपमान न हो जाए, इसलिए घर जा रहा हूं!
ओशो
· · ....... प्रेम आत्मा का भोजन है। प्रेम आत्मा में छिपी परमात्मा की ऊर्जा है। प्रेम आत्मा में निहित परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग ...