Friday, 22 January 2016
secrets of a long happy life ( in hindi)
Tuesday, 19 January 2016
How to become success in life for student {in hindi}
सभी सफल होना चाहते है सफलता सभी को अच्छी लगती है केवल कुछ ही लोग सफलता के शिखर पर पहुँच पाते है सफल तो सभी होते है अपने जीवन मे,मगर हम समझ नही पाते,एक छोटी सी कहानी आपने सुनी होगी ।
निष्काम कर्म का छोटा सा भी कृत्य सफल होता है जब निष्काम है अपेक्षा रहित है इसलिए जो भी मिल जाए वह बहुत है क्योकि कोई अपेक्षा ही नही थी जिसमे उसको छोटा बताया जा सके । इस समय आपका कर्म क्या है पढना, नम्बर्स के लिए नही पढ़ना हमारा इस समय कर्म है पढ़ना, जब आप अपना 100% दोगे तो नम्बर्स तो अपने आप आयेगे । जहाँ निष्काम कर्म होता है वहाँ फल छाया की तरह साथ साथ चलता है जो भी आपको मिलता है उसका enjoy करो मजा लो । mind आपका freash है उस मे कुछ भरा हुआ नही है mind आगे और बेहतर करेगा । जब हम कोई अपेक्षा नही रखते 70,80 या 50% भी क्यो न आये, जम कर सेलिब्रेट करे हमने अपना 100% दिया जो भी मिला उसकी हमे परवाह नही ।
Saturday, 16 January 2016
भीतर है शांति, और भीतर है सुख, और भीतर है समाधि
अगर तुम हिमालय गए हो तो तुमने इस चिड़िया को सुना होगा। इस दर्द भरी पुकार से हिमालय के सारे यात्री परिचित हैं। घने जंगलों में, पहाड़ी झरनों के पास, गहरी घाटियों में निरंतर सुनायी पड़ता है—जुहो! जुहो! जुहो! और एक रिसता दर्द पीछे छूट जाता है। इस पक्षी के संबंध में एक मार्मिक लोक—कथा है।
वह धूप में तपें गुलाब की तरह कुम्हलाने लगी। श्रृंगार छूटा, वेश—विन्यास छूटा, खाना—पीना भी छूट गया। अंत में सास ने कहा—अच्छा, तुम्हें कल भेज देंगे। सुबह हुई, उसने आकुलता से पूछा—जुहो? जाऊं? जुहो पहाड़ी भाषा में अर्थ रखता है—जाऊं? सुबह हुई, उसने पूछा—जुहो? जाऊं? सास ने कहा— भोल जाला। कल सुबह जाना। वह और भी मुरझा गयी, एक दिन और किसी तरह कट गया, दूसरे दिन उसने पूछा—जुहो? सास ने कहा—भोल जाला। रोज वह अपना सामान संवारती, रोज प्रीतम से विदा लेती, रोज सुबह उठती, रोज पूछती—जुहो? और रोज सुनने को मिलता— भोल जाला।
आगे हुए बिना कोई कीमत नहीं
Thursday, 3 December 2015
Water & ayurvrda
जल और आयुर्वेद
जल और भोजन, दो ऐसे तत्व हैं, जो हम ग्रहण करते हैं और इनको आयुर्वेद के सैद्धान्तिक परिप्रेक्ष्य में समझना आवश्यक है। बहुधा जल पीने में हम प्यास को ही प्रेरक मानते हैं, जब प्यास लगी, पानी पी लिया। कब पीना, कितना पीना, कैसे पीना, इस पर कई प्रचलित मान्यतायें हैं जिन्हें सार्वभौमिक मान लिया जाता है, पर गुण और प्रकृति के अनुसार जल के प्रभाव का सम्यक ज्ञान लाभकारी है।
जलं जीवनम्
जल सभी रसों का उत्पादक है, पाचन प्रक्रिया में भोजन से जो पोषक तत्व सोखे जाते हैं, उन्हें रस कहते हैं, रसों से ही रक्त आदि का निर्माण होता है। जल वैसे तो जिसमें मिलाकर पिया जाता है, उसी के गुण ले लेता है, पर इसके अपने ६ गुण भी हैं, शीत, शुचि, शिव, मृष्ट, विमल, लघु। धरती पर आया जल वर्षा का ही होता है, समुद्र से वाष्पित जल अन्य जल स्रोतों से वाष्पित जल की तुलना में अधिक क्षारीय होता है। वर्षाकाल का प्रथम जल और अन्य ऋतु में बरसा जल नहीं पीना चाहिये। बहता जल पीने योग्य होता है, पहाड़ों और पत्थरों से गिरने से जल की अशुद्धियाँ बहुत कम हो जाती हैं। स्थिर जल के स्रोतों में वही जल श्रेष्ठ होता है जिसे सूर्य का प्रकाश और पवन का स्पर्श मिलता रहे। यदि जल मधुर है तो त्रिदोषशामक, लघु और पथ्य होता है। क्षारीय है तो कफवात शामक, पर पित्त को बढ़ाता है। कषाय हो तो कफपित्त शामक, पर वात को बढ़ाता है।
हर स्थान से निकलने वाली नदियों के जल में कोई न कोई स्थानीय दोष होता है, उसका भी वर्णन वागभट्ट ने ५वें अध्याय में किया है। गौड़, मालवा और कोंकण क्षेत्र से निकलने वाली नदियों में अर्शरोग(बवासीर), महेन्द्र पर्वत ले निकलने वाली नदियों में उदररोग व श्लीपदरोग(हाथीपाँव), सह्याद्रि और विन्ध्य से निकलने वाली नदियों में पाण्डुरोग(एनीमिया) और शिरोरोग, पारियात्र(हिन्दुकुश) पर्वत से निकलने वाला जल त्रिदोष शामक, बल, पौरुष, शक्ति को उत्पन्न करने वाला होता है। इन स्थानों पर रहने वालों लोगों में इस जल से सात्म्य हो जाता है, पर बाहर से आये लोगों में रोग होने की संभावना बनी रहती है।
मन्दाग्नि, गुल्म, पाण्डु, उदररोग, अतिसार, अर्श और ग्रहणी रोग के लोगों को जल कम पीना चाहिये। स्वस्थ मनुष्य को भी अधिक जल नहीं पीना चाहिये, किन्तु ग्रीष्म और शरद में अधिक जल पिया जा सकता है। सामान्यतः शीतल जल का निषेध है, पर मदात्यय(मदिरा से होने वाले विकार), शरीर की ग्लानि, मूर्छा, वमन, परिश्रमजन्य थकावट, भ्रम, प्यास की वृद्धि, शरीर की ऊष्णता, आहार विहार जन्य दाह, रक्तपित्त और विषभक्षण जन्य विकार, इन सबके लिये शीतल जल पीना चाहिये। उष्ण जल, अग्निदीपक, पाचक, कण्ठशोधक, पचने में लघु, उष्ण, वस्ति का शोधक होता है। दक्षिण भारत के कई स्थानों पर भोजन के साथ गुनगुना पानी देते हैं, संभवतः उनकी परम्पराओं में यही गुण और सूत्र रहे होंगे। शीतल जल ६ घंटे में, गर्म कर ठंडा किया ३ घंटे में और गुनगुना जल १ घंटे में पच जाता है। गर्म कर ठंडे किय जल कफकारक नहीं होता है।
९० प्रतिशत रोगों का कारण हमारा पेट है। पेट में भोजन और जल ही जाते हैं। कितना भोजन किया, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि कितने प्रतिशत भोजन पचा। समुचित पाचन ही स्वास्थ्य का साधन है। कोई भी अन्न पहले सूर्य के प्रकाश में पकता है, उसके बाद रसोई में अग्नि की आँच में पकता है और अन्त में आमाशय में भी जठराग्नि में पचता है। पेट में भोजन जाते ही जठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है और तब तक रहती है, जब तक भोजन पच नहीं जाता है। श्रमशील व्यक्ति में एक घंटा, सामान्य व्यक्ति में डेढ़ घंटा और ठंडे स्थानों में रहने वालों के पेट में दो घंटे तक यह जठराग्नि प्रदीप्त रहती है। इस समय यदि पेट में जल गया तो वह जठराग्नि को मन्द या ठण्डा कर देगा और भोजन अपच रह जायेगा। यही अपचा भोजन सारे रोगों की जड़ है, डकार से लेकर, एसिडिटी, मोटापा, रक्त अम्लता, जोड़ों का दर्द, हृदयाघात और कैंसर जैसे भीषण रोग इसके कारण होते हैं। यदि भोजन ठीक से पच गया तो कभी कोई रोग हो ही नहीं सकते हैं। भोजन के बाद वात बढ़ना संकेत है, उसे उपेक्षित न करें, वात सूक्ष्म होती है और हर अंग प्रभावित करने में सक्षम भी।
यही कारण है कि भोजन के तुरन्त बाद पिये जल को विष माना गया है। भोजन के एक घंटे पहले और डेढ़ घंटे बाद तक जल नहीं पीना चाहिये। भोजन के पहले पिया जल शरीर को कृशकाय बनाता है और बाद में पिया जल शरीर में स्थूलता लाता है। भोजन करते समय, भोजन अटकने पर एक दो घूँट जल लिया जा सकता है। दो अन्नों के सन्धिस्थान(रोटी और चावल के बीच में) पर भी एक दो घूँट जल लाभदायक होता है क्योंकि दोनों अन्नों के लिये भिन्न एन्जाइमों का स्राव होता है। यदि भोजन के साथ कुछ तरल लेना हो तो सुबह फलों का रस, दोपहर में छाछ और रात में दूध लिया जा सकता है।
यद्यपि इनमें भी पर्याप्त जल होता है पर जल जिसमें मिलता है, उसके गुण ले लेता है।
पानी कैसे पियें? पानी को घूँट भर भर कर पानी पियें, जैसे गरम दूध पीते हैं। मुँह में क्षार बनता है, लगभग एक लाख ग्रन्थियाँ हैं और एक दिन में कई लीटर तक लार बनती है। पेट में अम्ल बनता है, जो पाचन में ही सहायक होता है। कहते हैं कि यदि पेट सामान्य रहे तो १०० वर्ष तक निरोग जिया जा सकता है। घूँट घूँट पिये पानी से अधिक लार अन्दर जायेगी जो पेट की अम्लता को शमित करेगी। तेज गति से पीने से भी अम्लता कम होगी पर उतनी मात्रा में नहीं। पशुओं को देखें कि वे भी ऐसे ही पीते हैं, चिड़िया बूँद बूँद पीती है, कुत्ता चाट चाट कर पीता है। लार विश्व की सबसे अच्छी औषधि है, इसको अन्दर जाते रहना आवश्यक है। पशुओं को देखिये, वे तो चाट कर अपने घाव तक ठीक लेते हैं। त्वचा के कई रोगों के लिये सुबह की लार अमृतसम है। जो लोग पान मसाला, गुटका, तम्बाकू आदि खाकर थूकते रहते हैं, उनसे बढ़ा अभागा कोई नहीं। एक ही स्थिति में थूक सकते हैं, जब कफ अधिक बढ़ा हो। तो पान खाने वाले क्या करें? पान बिना कत्था और सुपारी के साथ खायें और अन्दर ले लें। पान पित्त और कफ का नाशक है, चूना वात नाशक है, तो यह संयोग तीनों दोषों का निवारण करता है, पर पान देशी हो, तनिक कसैले स्वाद वाला।
पानी कैसा पियें? शीतल जल तो कभी न पियें, सामान्य तापमान का ही पियें, गुनगुना पानी पियें। पेट में ठंडा पानी जाने से शरीर का तापमान कम होता है और पेट में ऊष्मा पहुँचाने के लिये सारा रक्त पेट की ओर बहता है तो शरीर अपनी पूरी क्षमता से कार्य नहीं करता है। अधिक ठंडा पीने वालों को कब्ज की भी समस्या रहती है, क्योंकि ठंडे पानी का पृष्ठतनाव(सर्फेस टेंशन) अधिक रहता है, उससे आँतें संकुचित हो जाती है और मल का प्रवाह रोकती है।
सुबह उठते ही पानी पियें, बिना कुल्ला किये हुये, इसे ऊषापान कहते हैं। यदि ताँबे के बर्तन में रात भर का रखा जल हो तो अच्छा, नहीं तो जल गुनगुना कर लें। मात्रा लगभग एक लीटर, घँूट घूँट कर और धीरे धीरे। रात भर सोते समय सारी क्रियायें शिथिल हो जाती हैं, पर लार बनने की प्रक्रिया चलती रहती है,ब्रह्ममुहूर्त में बनी लार सर्वोत्तम होती है। इस लार का उपयोग चिकित्सा के लिये भी होता है। डायबिटीज के रोगियों के घाव ठीक करने में यह लार बड़ी उपयोगी होती है। चश्मे उतारने के लिये सुबह की लार आँखों में लगाने से अद्भुत लाभ हैं। लार में वह सब कुछ है जो माटी में है, जो शरीर में है, यही कारण है कि त्वचा में लगे दाग आदि भी इस लार से चले जाते हैं।
पानी खड़े होकर कभी न पियें, सदा ही बैठकर पियें, कहते हैं कि खड़े होकर जल पीने से गठिया आदि रोग हो जाते हैं। भार के अनुसार पानी पीना चाहिये। अपने वजन को दस से भाग देकर उसमें दो घटा दें, उतना लीटर पानी एक दिन में पिये, ७० किलो के व्यक्ति के लिये ५ लीटर। प्यास एक वेग भी है, कभी न रोकें, शरीर में जल की कमी होते ही वह रक्त से वह कमी पूरी करने लगता है।
जल जीवन है और जीवन का यह रूप जानना आवश्यक है।।
Sunday, 22 November 2015
दर्द में कैसे करे ध्यान
ध्यान के दौरान खुजली व दर्द जैसी बाधा डालने वाली भावनाओं से कैसे निबटा जाए ?
ध्यान में, ज्यादातर शारीरिक दर्द बाधा डालते हैं। क्या आप बताएंगे कि जब दर्द हो रहा है तब उस पर ध्यान कैसे किया जाए?
ओशो - यह वही है जिसकी मैं बात कर रहा था। यदि तुम दर्द महसूस करते हो तो इसके बारे में सतर्क रहो, कुछ करो नहीं। ध्यान बहुत बड़ी तलवार है। तुम सिर्फ दर्द पर ध्यान दो।
उदाहरण के लिए, तुम ध्यान के आखिरी चरण में शांति से बैठे हो, बिना हिले-डुले, और तुम बहुत सी परेशानियां शरीर में महसूस करोगे। तुम महसूस करोगे कि पैर मरते जा रहे हैं, सिर में भी खुजली हो रही है, तुम महसूस करोगे कि शरीर पर चींटियां रेंग रही हैं और तुमने बहुत बार देखा – वहां चींटियां नहीं हैं। रेंगना अन्दर महसूस हो रहा है, बाहर नहीं। तुम क्या करोगे? तुम महसूस करते हो पैर मरने जा रहे हैं – इस पर ध्यान करो, इसको सिर्फ सम्पूर्ण ध्यान दो। खुजली महसूस करो – खुजलाना मत, क्योंकि वह मदद नहीं करेगा। सिर्फ ध्यान दो। अपनी आंखें भी मत खोलो। सिर्फ अंदर से ध्यान दो और सिर्फ इंतजार करो और देखो, और कुछ क्षणों में खुजली गायब हो जाएगी। चाहे कुछ भी हो – यदि तुम दर्द भी महसूस करो, तेज दर्द पेट में या सिर में। यह संभव है, क्योंकि ध्यान में सारे शरीर में बदलाव आते हैं। ध्यान शरीर में रसायनिक बदलाव लाता है। नई चीजें होना शुरू हो जाती हैं; शरीर में एक अव्यवस्था होती है। कई बार पेट प्रभावित होता है क्योंकि पेट में तुमने बहुत सी भावनाएं दमित की हुई हैं, और उनमें उथल-पुथल मचती है। कई बार तुम्हें उल्टी आने को होगी, जी मिचलाएगा। कई बार तुम्हें तेज सिर दर्द महसूस होगा क्योंकि ध्यान तुम्हारे दिमाग का अन्दरूनी ढांचा बदल रहा होता है। ध्यान में तुम वास्तव में एक अव्यवस्था से गुजरते हो। जल्द ही चीजें व्यवस्थित हो जायेंगी। लेकिन, कुछ समय के लिए, हर चीज अव्यवस्थित होगी।
तो तुम्हें क्या करना है? सरलता से सिर में हो रहे दर्द को देखो; इसे देखते रहो। दृष्टा बने रहो। भूल जाओ कि तुम कर्ता हो, और धीरे-धीरे हर चीज शांत हो जाएगी और इतनी खूबसूरती से और इतनी सौम्यतापूर्वक कि तुम इसका विश्वास नहीं कर सकोगे यदि तुमने इसे अनुभव नहीं किया हो। और इतना ही नहीं कि सिर दर्द गायब हो जाएगा: वह ऊर्जा जिसने दर्द पैदा किया था उसे यदि सिर्फ देखा गया था, दर्द गायब हो जाएगा और वही ऊर्जा आनंद बन जाएगी। ऊर्जा वही है। दर्द और आनंद उसी ऊर्जा के दो आयाम हैं।
यदि तुम खामोशी से बैठे रहते हो और व्यवधानों पर ध्यान देते हो, सभी व्यवधान गायब हो जाएंगे। और जब सभी व्यवधान गायब हो जाएंगे, तुम्हें अचानक पता चलेगा कि सारा शरीर गायब हो गया है।
वास्तव में, क्या हो रहा था? ये चीजें क्यों हो रही थी? और जब तुम ध्यान नहीं करते हो तब वे नहीं होतीं। तुम सारे दिन मौजूद हो और हाथ कभी खुजली नहीं करते, सिर में दर्द नहीं होता और पेट भी बिल्कुल सही है और पैर भी सही हैं। सभी चीजे सही हैं। वास्तव में क्या हो रहा है? ये चीजें ध्यान के दौरान अचानक क्यों शुरु हो जाती हैं? शरीर लंबे समय तक प्रभुत्व में रहा है, और ध्यान में तुम शरीर को उसके प्रभुत्व के बाहर फेंक रहे हो। तुम इसे अपदस्थ कर रहे हो। यह चिपका रहता है; यह हर संभव तरीके से प्रभुत्व में रहने की कोशिश करता है। यह तुम्हें हटाने के लिए बहुत सी चीजे पैदा करेगा जिससे कि ध्यान खत्म हो जाये; तुम संयम खो देते हो और शरीर प्रभुत्व मंा आ जाता है। अब तक, शरीर प्रभुत्व में रहा है और तुम गुलाम रहे हो। ध्यान के माध्यम से, तुम सभी चीजें बदल रहे हो; यह एक महान क्रांति है। और, वास्तव में, कोई भी सम्राट ताकत नहीं छोड़ना चाहता।
शरीर राजनैतिक दांव-पेंच करता है – इसलिए यह हो रहा है। जब वह काल्पनिक दर्द पैदा करता है, तो खुजली होती है, चींटी चल रही होती हैं, शरीर तुम्हें भटकाने की कोशिश करता है। और यह स्वाभाविक है, क्योंकि शरीर लंबे समय से शासक रहा है, बहुत से जन्मों से यह सम्राट रहा है और तुम गुलाम। अब तुम हर चीज को पूरा बदल रहे हो। तुम अपनी सत्ता पुन: पाना चाह रहे हो, और यह स्वाभाविक है कि शरीर तुम्हें भटकाने की जो भी कोशिश कर सकता है करेगा। यदि तुम विचलित हो जाते हो, तुम खो जाओगे। साधारणतः, लोग इन चीजों को दबा देते हैं। वे मंत्र का उच्चारण शुरू देंगे; वे शरीर को नहीं देखेंगे।
मैं तुम्हें किसी तरह का दमन नहीं सिखा रहा हूं। मैं सिर्फ होश सिखाता हूं। सिर्फ देखो, ध्यान दो, और क्योंकि यह काल्पनिक है, यह तुरंत गायब हो जाएगा। जब सभी दर्द और खुजली और चीटियां गायब हो जाएंगी और शरीर गुलाम की तरह सही जगह पर स्थिर हो जाएगा, अचानक बहुत-सा आनंद उत्पन्न होता है तुम उसे संजो नहीं सकते। अचानक इतना उत्सव पैदा होता है कि तुम प्रकट नहीं कर सकते; तुम्हारे भीतर से एक ऐसी शांति छलकती है जो समझ से परे है, एक आनंद जो कि इस संसार का नही है।
ओशो, योग: दी मास्टरी बीओडं माइंड प्रवचन #2 – मैं केवल होश सिखाता हूं
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