Wednesday, 18 March 2015

think big for success (in hindi)

                                          Image result for happy women                                                                                                                                                                                                                                                                                                                   सभी महापुरुषों का कहना है-‘ अगर  जिन्दगी मे सफल बनना है त्तो अपनी कमिया  देखो’ यह अच्छी बात है अपनी कमिया पहचाननी चाहिए और उन्हे पहचानकर  दूर करने का प्रयास करना चाहिए । मगर हमेशा अपने नकरात्मक पक्ष पर ही ध्यान न दे । अगर हम हमेशा अपने अन्दर कमियाँ ही देखेंगे तो  हमारी मानसिकता भी negative  हो जायेगी । और हम परेशानियों  मे फंस जायेगे,  life मे  problem create  हो जायेगी । हमे अपने अन्दर का दुसरा पक्ष भी जानना होगा जो गुणो से भरा हुआ है । हमे अपने गुणो की लिस्ट बनानी चाहिए ।

 अगर आप व्यापारी है, छात्र है, कही नौकरी करते है,सेल्समैन है,  सोचो जो आपके पास काबलियत है आपसे भी कम गुणो वाले लोग आप से कही आगे है । आपमे उनसे ज्यादा काबलियत है फिर भी आप आगे नही बढ  पा रहे । कही एसा तो नही आपने कभी बड़ा सोचा ही नही,

 अधिकांशतः लोग सफलता के लिये अच्छे कालेज, डिग्रियाँ या पारिवारिक पृष्ठभूमि  को सफलता का पैमाना मान लेते है । मगर यह कोइ पैमाना नही है आपको तो आपकी सोच से नापा जाता है आप कितना बड़ा सोचते है । हम अपनी सोच से ही सफल लोगो मे अपना नाम लिखा सकते है ।

 संदीप महेशवरी सुहास गोपीनाथ, कमेडियन कपिल शर्मा आदि ये एसे नाम है जो middle class family  से थे, ये पढ़ाई मे भी औसत थे । मगर आज ये सफलता की बुलंदियों पर है ।

फर्क कया है ?

 इन्होने हमेशा बडा सोचा । अपनी कमियो को दूर करने का प्रयास किया मगर focus अपने गुणो पर रखा । अधिकांशतः लोग अच्छे कालेज अच्छे मार्क्स या पैसे वाले पारिवारिक पृष्ठभूमि  को ही सफलता का पैमाना मान लेते है यह होना बुरा नही है मगर यह सफलता का पैमाना नही हो सकता । हमेशा बड़ा सोचो positive words का प्रयोग करो । हम जो बोलते है सोचते है उसका मन पर सबसे ज्यादा असर होता है । किसी व्यक्ति के मन मे यह बात बैठ जाये – वह बीमार है वह न भी होगा तो भी हो जायेगा । जैसे हम आम बोलचाल की भाषा मे बोलते है – उसके साथ बहुत बुरा हुआ, मै झुठ नही बोलता, दोनो ही negative words है जो आपके मन पर प्रभाव डालते है । हम इन्हे positive words मे भी बोल सकते है जैसे – उसके साथ अच्छा नही हुआ,मै सत्य बोलने का प्रयास करता हुं । मन हमारा एक रिकार्डर की तरह है जो हम बोलते है सोचते है वह मन मे रिकार्ड होता चला जाता है और हम वैसे ही बनते चले जाते है ।

 जैसे कोइ कहता है ‘मै बहुत परेशान हुं मेरे सामने एक के बाद एक समस्याये आती रहती है’ तो एसा व्यक्ति परेशान रहेगा और जिससे वह कह रहा है उसको भी वह negative energy  दे रहा है वह भी गम्भीर हो जाता है । जबकि जो positive सोचता है वह एसा नही कहता वह कुछ इस तरह से कहता है-‘ मेरे सामने एक के बाद एक चुनौती आती है और मै उनका डटकर सामना करता हुं ।‘ इससे सामने वाले पर भी positive असर पड़ता है । हमे अपनी सोच का विस्तार करना होगा अपने मन से negative words  को निकाल कर फेक दो जो भी सोचो, बोलो positive बोलो ।

 हमेशा अपने को सफल मानो आगे और सफल होना है अपने शब्दकोष से असफल शब्द हटा दो । अपने को प्रत्येक परिस्थिति मे सफल मानो । परिस्थिति आपके अनूकुल भी हो सकती है प्रतिकुल भी , मगर इससे कोइ फर्क नही पड़ता । परिस्थितिया तो आती जाती रहती है । एक के बाद एक जीवन मे चु्नौती आती है उनका डटकर सामना करे उसको कभी समस्या न माने सिर्फ चुनौती माने और अपने को सफल मानना शुरु कर दीजिय्रे ।

 आपसे कोइ पूछता है आप कैसे हो ? आप कया जवाब देते है इसका आप के व्यक्तित्व पर बहुत प्रभाव पड़ता है आप कहते है बस ठीक हुं, काम करते हुए थकान हो रही है या मेरा स्वास्थय ठीक नही रहता है । इस प्रकार आप अपने अन्दर  negative energy   पैदा कर रहे है आप मायूस रहेगे  ।

 अगर आप जोश मे बोलते हो –‘ मै ठीक हुं जिन्द्गी का मजा ले रहा हुं ।

आप हमेशा जिन्दगी का मजा लेते रहेगे आप मे positive energy बनती है । आप सचमुच जिन्द्ग़ी का मजा लेते रहेगे प्रत्येक परिस्थिति मे आप अपने को ताजगी से भरा हुआ महसूस करेगे ।
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 आप अपने दोस्तो  पत्नि बच्चो  य अन्य किसी के बारे मे बात करते हुए हमेशा  positive words का प्रयोग करे उनकी सिर्फ तारीफ करे प्रत्येक व्यक्ति के दो पहलू होते है एक अच्छा एक बुरा , उसके सिर्फ अच्छे पहलू पर नजर डाले। हमेशा दिल खोलकर उनकी तारीफ करे, कभी उनके बुरे पहलु पर नजर न डाले,वह आपको उसकी बुराइ करने के लिए प्रेरित करता है । और आपके अन्दर  negative energy    बनने लगती है । जब आप दुसरो के अच्छे पहलु पर ही नजर डालते है सबकी तारीफ करते है दुसरो की नजरो मे आप सदा अच्छे इंसान बने रहेंगे । positiva words का ही प्रयोग करने से आपमे positive energy ही बनेगी  ।

 दुसरो को ही नही अपनी भी तारीफ कीजिए जो आप है अपने को उससे बढ़कर मानिए ।  बड़ी-बड़ी कल्पना कीजिए सपने देखिए,सोचिए -‘ यह सब मै एक दिन हासिल कर लूँग 
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 मेरा एक दोस्त है हमेशा रोता झीकता रहता है अपने को याद दिलाता रहता है उसकी आय कम है जबकि उसके पास अच्छा काम है वह अपने नौकरो को उचित वेतन नही दे पाता हमेशा चिड़चिड़ा रहता है उसके यहा कोइ भी नौकर ज्यादा समय तक टिक नही पाता । वह ग्राहको से  भी अच्छा व्यवहार नही करता,उनसे अकसर झगड़ता रहता है। वह हमेशा दुखी रहेगा, कभी सफल नही हो पायेगा ।

 जबकि मेरे एक परिचित का सोचने का ढंग बिल्कुल अलग है । वह हमेशा भविष्य की कल्पना करता रहता है एक शानदार मकान बढिया गाड़ी हमेशा बड़े व्यापार की कल्पना करता है । हमेशा अपने नौकरो की तारीफ करता है उन्हे उचित वेतन देता है उन्हे बोनस भी देता है । नौकर भी सभी कार्य अपना समझकर करते है ।

वह कभी अपने को सस्ता करके नही आंकता,हमेशा खुश रहता है । सबकि तारीफ करता है । हमेशा बड़ा सोचता है और इन्हे भविष्य मे इन सब बातो का फायदा अवश्य मिलेगा, वास्तव मे देखा जाय तो वह अच्छी जिन्दगी की तरफ तेजी से बढ़ रहे है । सफलता के मूलभूत सिद्धांत  अपने जीवन मे उतार लिया है । यह महत्वपूर्ण  नही है आज आप के पास क्या है?  महत्वपूर्ण है भविष्य मे आप के पास क्या हो सकता है ?
 अपने को कभी सस्ता मत मानिए,हमेशा जहाँ आप है उससे बड़ा सोचिए जो भी आप सपने देखते है आप वह सब कुछ पा सकते है बस आवश्यकता है अपना नजरिया बदलने की ।

 हमेशा positive सोचिए positive words बोलिए, positive energy आपमे बनेगी और आप वह सब कुछ पा सकते है  जिसके आप सपने देखते है । 

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Sunday, 1 March 2015

how to be success (in hindi)

                                           Image result for how to success                                    विवेकनन्द ने कहा है-
             जो अपने हिस्से मे आये हुए छोटे से काम को करते समय भी बुदबुदाता था वह प्रत्येक काम मे बुदबुदायेगा । सदैव बुदबुदाते हुए वह एक दुखपूर्ण जीवन बितायेगा और प्रतियेक कार्य मे असफल होगा किन्तु वह व्यक्ति जो अपने कर्तव्य को पूरी शक्ति के साथ करता रहेगा,पहिये मे अपना कन्धा लगाये रहेगा । अन्त मे वह अवश्य ही फल पायेगा और अधिकारिक उत्तदायित्व निभाने का अवसर उसे मिलेगा ।
 जिस व्यक्ति को विश्वास होता है कि काम कर लेगा उसे हमेशा उस काम को करने का तरीका सुझ जाता है।
                                       Image result for dream women                                
  प्रत्येक व्यक्ति बड़े-बड़े सपने तो देखता  है ऊचाईयो को छुना चाहता है पर कितने व्यक्ति अपने सपने साकार कर पाते  है । कुछ चन्द जीव ही अपनी मंजिल तक पहुँच पाते है । हम बात करते है उन व्यक्तियो की जो सपने तो देखते है अपने लक्ष्य का भी निर्धारण कर लेते है मगर कर्म नही करना चाहते किस्मत के  सहारे बैठे रहते है । सोचते रहते है किस्मत मे होगा तो भगवान भी हमसे नही छिन सकता । कुछ लोग कर्म तो करते है मगर उनमे धैर्य नही होता वे तुरन्त फल की इच्छा करते है । एसे लोग कभी मंजिल तक नही पहुच पाते । हमेशा अपनी किस्मत को दोष  देते रहते है ।

  धैर्य  ही सफलता की कुन्जी है । आप एकाग्रता व लगन से अपनी मंजिल की और बढे, धैर्य रखे आप अवश्य सफल होंगे कर्म करते हुए अपने लक्ष्य पर फोकस रखो । जिस प्रकार अर्जुन का लक्ष्य सिर्फ चिड़िया की आँख थी । गुरु द्रोणाचार्य ने जब अर्जुन से पुछा –तुम्हे क्या दिख रहा है ? तब उसका जवाब था मुझे सिर्फ आँख दिख रही हैं । अर्जुन का लक्ष्य आँख थी । उसे चिड़िया भी नही दिख रही थी उसका फोकस सिर्फ अपने लक्ष्य पर था ।

 हमे अपने लक्ष्य का निर्धारण करना चाहिए फिर उसे अपना लक्ष्य बनाए । एकाग्रता लगन से हमे अपने लक्ष्य को साधना है । हमे अपने मन को आस-पास दाये-बाये भटकने नही देना है ।  हमे चिड़िया नही वरन उसकी आँख ही दिखनी चाहिए । हमे सफलता अवश्य मिलेगी ।

   कुछ लोग थोड़ा सा कार्य करते है सोचते है हमे वह सब कुछ मिल जाये जिसे उन्होने अपना लक्ष्य बनाया था । एसे लोग अपने लक्ष्य से तो भटक जाते है बल्कि वे जहां से चले थे उससे भी पीछे पहुँच जाते है
                             

 उतावलापन कभी मत करो धर्य रखो,पूरी एकाग्रता और लगन से कार्य करो। अपने मे कमी देखो,आपमे कमी कहा है आत्मचिन्तन किजिये मनोवेग आपको कहाँ परेशान करता है यही से आप शान्ति का रास्ता पा सकेगें । आप जल्दी आवेश मे आ जाते है, शीघ्र क्रोधित हो जाते है आपमे सहन करने की क्षमता कम है, अगर आपके अनुरुप कार्य नही होता तो आप झल्ला जाते है अपना सन्तुलन खो देते है तो आपको कभी सफलता नही मिलेगी । अगर मिलती भी है तो वह आपके गुण कौशल के अनुसार काफी कम होगी ।
                           Image result for how to success                              

जीवन मे सफलता मिलती है धैर्य से, संयम से,  आपमे काबलियत है तो आपने जो लक्ष्य निर्धारित किया है उस तक अवश्य पहुचेगे । अगर आपकी प्रकृति  मे क्रोध और कठोरता है तो उसे छोड़ दीजिये । आपके ह्र्दय की यह कठोर और क्रूर दशाये आपका हित तो बिलकुल नही करती, यह आपकी सफलता मे सबसे बड़ी बाधा है । इससे आप  दूसरो   को व अपने आप को दुख के अतिरिक्त कुछ नही दे सकते ।

 यदि आपको कोइ कटु वचन कहता है या आपके साथ दुरव्यवहार करता है बदले मे आप भी उसके साथ वैसा ही व्यवहार करते  है दुसरे का कटु वचन व व्यवहार आपको चुभता है तो उसके बदले मे किया गया आपका व्यवहार भी उसे उतना ही ठेस पहुचायेगा कोइ औचित्य नही बदले मे आप भी वैसा ही व्यवहार करे ।

 आपको नरम पड़ते हुए अग्नि मे पानी डालने का काम करना  चाहिए। पानी डालने से ही अग्नि ठंडी होती है । सोचने वाली बात है क्या आग आग को बुझा पाती है ? क्रोधपूर्ण व्यवहार से कभी भी क्रोध पर नियन्त्रण नही किया जा सकता है ।

 शान्तिप्रिय दयालु आत्मनिर्भर बने । धैर्य रखना सिखिए । सफलता को संयम के साथ स्विकार करे । असफलता पर विचलित न हो क्योकि असफलता ही सफलता की सीढ़ी  है हमेशा विनम्र बने रहिए आवेश को अपने नजदीक न आने दे । देखना एक दिन आपकी गिनती सफल लोगो मे होने लगेगी ।


  एक विचार लो उस विचार को अपना जीवन बना लो-उसके बारे मे सोचो उसके सपने देखो,उस विचार को जियो,अपने मस्तिष्क, मांसपेंशियो,नसो,शरीर के प्रत्येक हिस्से को उस विचार मे डूब जाने दो, और बाकी सभी विचारो को किनारे रख दो, यही सफल होने का तरीका है                                                 विवेकानन्द 

Saturday, 28 February 2015

सफल प्रेम भी हो जाते हैं क्यों असफल-...... Osho

सफल प्रेम भी हो जाते हैं
क्यों असफल-......

जॉर्ज बर्नाड शॉ ने कहा है, दुनिया में दो ही दुख हैं- एक
तुम जो चाहो वह न मिले और दूसरा तुम जो चाहो वह मिल जाए। और
दूसरा दुख मैं कहता हूं कि पहले से बड़ा है।
क्योंकि मजनू को लैला न मिले तो भी विचार में
तो सोचता ही रहता है कि काश, मिल जाती! काश
मिल जाती, तो कैसा सुख होता! तो उड़ता आकाश में,
कि करता सवारी बादलों की, चांद-तारों से बातें,
खिलता कमल के फूलों की भांति। नहीं मिल
पाया इसलिए दुखी हूं।
मजनू को मैं कहूंगा, जरा उनसे पूछो जिनको लैला मिल गई है। वे
छाती पीट रहे हैं। वे सोच रहे है कि मजनू
धन्यभागी था, बड़ा सौभाग्यशाली था। कम से कम
बेचारा भ्रम में तो रहा। हमारा भ्रम भी टूट गया।
जिनके प्रेम सफल हो गए हैं, उनके प्रेम भी असफल
हो जाते हैं। इस संसार में कोई भी चीज सफल
हो ही नहीं सकती। बाहर
की सभी यात्राएं असफल होने को आबद्ध हैं।
क्यों? क्योंकि जिसको तुम तलाश रहे हो बाहर, वह भीतर
मौजूद है। इसलिए बाहर तुम्हें दिखाई पड़ता है और जब तुम पास पहुंचते
हो, खो जाता है। मृग-मरीचिका है। दूर से दिखाई पड़ता है।
रेगिस्तान में प्यासा आदमी देख लेता है कि वह रहा जल
का झरना। फिर दौड़ता है, दौड़ता है और पहुंचता है, पाता है
झरना नहीं है, सिर्फ भ्रांति हो गई थी। प्यास ने
साथ दिया भ्रांति में। खूब गहरी प्यास थी इसलिए
भ्रांति हो गई। प्यास ने ही सपना पैदा ‍कर लिया। प्यास
इतनी सघन थी कि प्यास ने एक भ्रम पैदा कर
लिया।
बाहर जिसे हम तलाशने चलते हैं वह भीतर है। और जब
तक हम बाहर से बिलकुल न हार जाएं, समग्ररूपेण न हार जाएं तब तक
हम भीतर लौट भी नहीं सकते।
तुम्हारी बात मैं समझा।
किस-दर्जा दिलशिकन थे
मुहब्बत के हादिसे
हम जिंदगी में फिर कोई
अरमां न कर सके।
एक बार जो मोहब्बत में जल गया, प्रेम में जल गया, घाव खा गया, फिर
वह डर जाता है। फिर दुबारा प्रेम का अरमान
भी नहीं कर सकता। फिर प्रेम
की अभीप्सा भी नहीं कर
सकता।
दिल की वीरानी का क्या मजकूर
है,
यह नगर सौ मरतबा लूटा गया।
और इतनी दफे लुट चुका है यह दिल! इतनी बार
तुमने प्रेम किया और इतनी बार तुम लुटे हो कि अब डरने लगे
हो, अब घबड़ाने लगे हो
।
मैं तुमसे कहता हूं, लेकिन तुम गलत जगह लुटे। लुटने
की भी कला होती है। लुटने के
भी ढंग होते हैं, शैली होती है। लुटने
का भी शास्त्र होता है। तुम गलत जगह लुटे। तुम गलत
लुटेरों से लुटे।
तुम देखते हो, हिंदू बड़ी अद्भुत कौम है। उसने
परमात्मा को एक नाम दिया हरि। हरि का अर्थ होता है- लुटेरा, जो लूट ले,
जो हर ले, छीन ले, चुरा ले। दुनिया में किसी जाति ने
ऐसा प्यारा नाम परमात्मा को नहीं दिया है। जो हरण कर ले।
लुटना हो तो परमात्मा के हाथों लुटो। छोटी-
छोटी बातों में लुट गए! चुल्लू-चुल्लू पानी में डूबकर
मरने की कोशिश की, मरे
भी नहीं, पानी भी खराब
हुआ, कीचड़ भी मच गई, अब बैठे हो। अब मैं
तुमसे कहता हूं, डूबो सागर में। तुम कहते हो, हमें डूबने
की बात
ही नहीं जंचती क्योंकि हम डूबे कई
दफा। डूबना तो होता ही नहीं, और
कीचड़ मच जाती है। वैसे ही अच्छे
थे। चुल्लू भर पानी में डूबोगे तो कीचड़
मचेगी ही। सागरों में डूबो। सागर
भी है।
मेरी मायूस मुहब्बत की
हकीकत मत पूछ
दर्द की लहर है
अहसास के पैमाने में।
तुम्हारा प्रेम सिर्फ एक दर्द
की प्रतीति रही।
रोना ही रोना हाथ लगा, हंसना न आया। आंसू
ही आंसू हाथ लगे। आनंद, उत्सव की कोई
घड़ी न आई।
इश्क का कोई नतीजा नहीं
जुज दर्दो-आलम
लाख तदबीर किया कीजे
हासिल है वही।
लेकिन संसार के दुख का हासिल यही है कि दर्द के सिवा कुछ
भी नतीजा नहीं है।
इश्क का कोई नतीजा नहीं
जुज दर्दो-आलम।
दुख और दर्द के सिवा कुछ
भी नतीजा नहीं है।
लाख तदबीर किया कीजे
हासिल है वही।
यहां से कोशिश करो, वहां से कोशिश करो, इसके प्रेम में पड़ो, उसके प्रेम
में पड़े, सब तरफ से हासिल यही होगा। अंतत: तुम पाओगे
कि हाथ में दुख के अतिरिक्त और कुछ
भी नहीं है। राख के सिवा कुछ हाथ में
नहीं रह गया है। धुआं ही धुआं!
लेकिन मैं तुमसे उस लपट की बात कर रहा हूं जहां धुआं
होता ही नहीं। मैं तुमसे उस जगत
की बात कर रहा हूं जहां आग
जलाती नहीं, जिलाती है। मैं
भीतर के प्रेम की बात कर रहा हूं।
मेरी भी मजबूरी है। शब्द तो मुझे वे
ही उपयोग करने पड़ते हैं, जो तुम भी उपयोग
करते हो तो मुश्किल खड़ी होती है। क्योंकि तुमने
अपने अर्थ दे रखे हैं।
जैसे ही तुमने सुना 'प्रेम', कि तुमने जितनी फिल्में
देखी हैं, उनका सबका सार आ गया। सबका निचोड़, इत्र। मैं
जिस प्रेम की बात कर रहा हूं वह कुछ और।
मीरा ने किया, कबीर ने किया, नानक ने किया,
जगजीवन ने किया। तुम्हारी फिल्मोंवाला प्रेम
नहीं, नाटक नहीं। और जिन्होंने यह प्रेम
किया उन सबने यहीं कहा कि वहां हार नहीं है,
वहां जीत ही जीत है। वहां दुख
नहीं है, वहां आनंद की पर्त पर पर्त
खुलती चली जाती है। और अगर तुम
इस प्रेम को न जान पाए तो जानना, जिंदगी व्यर्थ गई।
दूर से आए थे साकी,
सुनकर मैखाने को हम।
पर तरसते ही चले,
अफसोस पैमाने को हम।
मरते वक्त ऐसा न कहना पड़े तुम्हें कि कितनी दूर से आए
थे। दूर से आए थे साकी सुनकर मैखाने को हम-
मधुशाला की खबर सुनकर कहां से तुम्हारा आना हुआ
जारा सोचो तो! कितनी दूर की यात्रा से तुम आए हो।
पर तरसते ही चले अफसोस पैमाने को हम- यहां एक घूंट
भी न मिला।
मरते वक्त अधिक लोगों की आंखों में यही भाव
होता है। तरसते हुए जाते हैं। हां, कभी-
कभी ऐसा घटता है कि कोई भक्त, कोई
प्रेमी परमात्मा का तरसता हुआ नहीं जाता, लबालब
जाता है।
मैं किसी और प्रेम की बात कर रहा हूं। आंख
खोलकर एक प्रेम होता है, वह रूप से है। आंख बंद करके एक प्रेम
होता है, व अरूप से है। कुछ पा लेने की इच्छा से एक प्रेम
होता है वह लोभ है, लिप्सा है। अपने को समर्पित कर देने का एक प्रेम
होता है, वही भक्ति है।
तुम्हारा प्रेम तो शोषण है। पुरुष स्त्री को शोषित
करना चाहता है, स्त्री पुरुष को शोषित
करना चाहती है। इसीलिए तो स्त्री-
पुरुषों के बीच सतत झगड़ा बना रहता है। पति-
पत्नी लड़ते रहते हैं। उनके बीच एक कलह
का शाश्वत वातावरण रहता है। कारण है क्योंकि दोनों एक-दूसरे
को कितना शोषण कर लें, इसकी आकांक्षा है। कितना कम
देना पड़े और कितना ज्यादा मिल जाए इसकी चेष्टा है। यह
संबंध बाजार का है, व्यवसाय का है। मैं उस प्रेम की बात कर रहा हूं, जहां तुम परमात्मा से
कुछ मांगते नहीं, कुछ भी नहीं।
सिर्फ कहते हो, मुझे अंगीकार कर लो। मुझे
स्वीकार कर लो। मुझे चरणों में पड़ा रहने दो। यह
मेरा हृदय किसी कीमत
का नहीं है, किसी काम
का नहीं है, मगर चढ़ाता हूं तुम्हारे चरणों में। और कुछ
मेरे पास है भी नहीं। और चढ़ा रहा हूं
तो भी इसी भाव से चढ़ा रहा हूं-
-'
त्वदीयं वस्तु गोविंद तुभ्यमेव समर्पयेत्।'
तेरी ही चीज है।
तुझी को वापस लौटा रहा हूं। मेरा इसमें कुछ है
भी नहीं। देने का सवाल
भी नहीं है, देने की अकड़
भी नहीं है। मगर तुझे और तेरे चरणों में रखते
ही इस हृदय को शांति मिलती है, आनंद मिलता है,
रस मिलता है। जो खंड टूट गया था अपने मूल से, फिर जुड़ जाता है।
जो वृक्ष उखड़ गया था जमीन से, उसको फिर जड़ें मिल
जाती हैं; फिर हरा हो जाता है, फिर रसधार
बहती है, फिर फूल खिलते हैं, फिर
पक्षी गीत गाते है, फिर चांद-तारों से मिलन
होता हैं।
परमात्मा से प्रेम का अर्थ है कि इस समग्र अस्तित्व के साथ मैं अपने
को जोड़ता हूं। मैं इससे अलग-अलग नहीं जिऊंगा, अपने
को भिन्न नहीं मानूंगा। अपने को पृथक मानकर
नहीं अपनी जीवन-व्यवस्था बनाऊंगा।
मैं इसके साथ एक हूं। इसकी जो नियति है
वही मेरी नियति है। मैं इस धारा के साथ बहूंगा,
तैरूंगा नहीं। यह जहां ले जाए! यह डुबा दे तो डूब जाऊंगा।
ऐसा समर्पण परमात्म प्रेम का सूत्र है। खाली मत जाना।
मैकशों ने पीके तोड़े जाम-ए-मै
हाये वो सागर जो रक्खे रह गए।
ऐसे ही रक्खे मत रह जाना।
पी लो जीवन का रस। तोड़ चलो ये प्यालियां। और
उसकी नजर एक बार तुम पर पड़ जाए और
तुम्हारा जीवन रूपांतरित हो जाएगा।
लाखों में
इंतिखाब के काबिल बना दिया।
जिस दिल को
तुमने देख लिया दिल बना दिया।।
जरा रखो उसके चरणों में। जरा झुको। एक नजर उसकी पड़
जाए, एक किरण उसकी पड़ जाए, और तुम रूपांतरित हुए।
लोहा सोना हुआ। मिट्टी में अमृत के फूल खिल जाते हैं।
आखिरी जाम में क्या बात थी
ऐसी साकी।
हो गया पी के जो खामोश
वो खामोश रहा।
यहां तुमने बहुत तरह के जाम पीए। आखिरी जाम
- उसकी मैं बात कर रहा हूं।
आखिरी जाम में क्या बात थी
ऐसी साकी।
हो गया पी के जो खामोश
वो खामोश रहा।
उसको पी लोगे तो एक गहन सन्नाटा हो जाएगा। सब शांत, सब
शून्य, सब मौन। भीतर कोई विचार की तरंग
भी नहीं उठेगी।
उसी निस्तरंग चित्त को समाधि कहा है।
उसी निस्तरंग चित्त को बोध होता है, मैं कौन हूं।
मैं किसी और ही प्रेम की बात कर
रहा हूं, तुम किसी और ही प्रेम
की बात सुन रहे हो। मैं कुछ बोलता हूं, तुम कुछ सुनते हो।
यह स्वाभाविक है शूरू-शुरू में। धीरे-धीरे बैठते-
बैठते मेरे शब्द मेरे अर्थों में तुम्हें समझ में आने लगेंगे। सत्संग
का यही प्रायोजन है। आज नहीं समझ में आया,
कल समझ में आएगा, कल नहीं तो परसों।
सुनते-सुनते...। कब तक तुम जिद करोगे अपने ही अर्थ
की? धीरे-धीरे एक नए अर्थ
का आविर्भाव होने लगेगा।
मेरे पास बैठकर तुम्हें एक नई भाषा सीखनी है।
एक नई अर्थव्यवस्था सीखनी है। एक नई भाव-
भंगिमा, जीवन की एक नई मुद्रा! तुम्हारे
ही शब्दों का उपयोग करूंगा, लेकिन उन पर
अर्थों की नई कलम लगाऊंगा। इसलिए जब
भी तुम्हें मेरे किसी शब्द से अड़चन हो तो खयाल
रखना, अड़चन का कारण तुम्हारा अर्थ होगा, मेरा शब्द नहीं।
तुम भी कोशिश करना कि मेरा अर्थ क्या है। तुम अपन अर्थों को एक तरफ सरकाकर रख दो। तुम तत्परता दिखाओ मेरे
अर्थ
को पकड़ने की। और तत्परता दिखाई तो घटना निश्चित घटने
वाली है।

Tuesday, 24 February 2015

Friday, 20 February 2015

osho anmol vachan(in hindi)

                                         Image result for osho                                                                                                                                                                                                                                           मैं एक महानगरी में था! वहां कुछ युवक मिलने आए! वे पूछने लगे: "क्या आप ईश्वर में विशवास करते है?" मैंने
कहा: "नहीं! विशवास का और ईश्वर का क्या संबंध?मैं तो ईशवर को जनता हूं!" फिर मैंने एक कहानी कही
किसी देश में क्रांति हो गई थी! वहां केक्रांतिकारी सभी कुछ बदलने में लगे थे! धर्म को भी वे नष्ट करने पर उतारूं थे! उसी सिलसिले में एक वृद्ध फ़क़ीर को पकड़ कर अदालत में लाया गया! उस फ़क़ीर से उन्होंने पूछा: "ईश्वर में क्यों विश्वास करते हो?" वह फ़क़ीर बोला: "महानुभाव, विशवास मैं नहीं करता! लेकिन, ईश्वर है! अब मैं क्या करूं?" उन्होंने पूछा: "यह
तुम्हें कैसे ज्ञात हुआ कि ईश्वर है?" वह बूढ़ा बोला: "आंखें खोलकर जब से देखा, तब से उसके अतिरिक्त और कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता है!" उस फ़क़ीर के प्रत्युत्तरों ने अग्नि घृत का काम किया! वे क्रन्तिकारी बहुत क्रुद्ध हो गए और बोले: "शीघ्र ही हम तुम्हारे सारे साधुओंं को मार डालेंगे! फिर.… ? वह बूढ़ा हंसा और बोला: "जैसी ईश्वर की मर्जी!" "लेकिन हमने तो धर्म के सारे
चिन्हों को ही मिटा डालने का निशचय किया है! ईश्वर का कोई भी चिन्ह हम संसार में न छोड़ेंगे!" वह बूढ़ा बोला: "बेटे! यह बड़ा ही कठिन काम तुमने चुना है, लेकिन ईश्वर की जैसी मर्जी! सब चिन्ह कैसे मिटाओगे? जो भी शेष होगा, वही उसकी खबर देगा: कम से कम तुम तो शेष रहोगे ही, तो तुम्ही उसकी खबर दोगे! ईश्वर को मिटाना असंभव है, क्योंकि ईश्वर तो समग्रता है!" ईश्वर को एक व्यक्ति की भांति सोचने से ही सारी भ्रांतियां 
खड़ी हो गई है! ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं! वह तो जो है, वही है! और ईश्वर में विशवास करने के विचार से भी बड़ी भूल हो गई है! प्रकाश में विशवास करने का क्या अर्थ? उसे तो आंखें खोलकर ही जाना जा सकता है विशवास अज्ञान का समर्थक है और अज्ञान एकमात्र पाप है! आंखों पर पट्टियां बंधा विशवास नहीं, वरन पूर्णरूपेण खुली हुई आँखोंवाला विवेक ही मनुष्य को सत्य ताल ले जाता है!
और सत्य ही परमात्मा है! सत्य के अतिरिक्त और कोई परमात्मा नहीं है ।।

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" मानते चले जाएंगे लोग, क्योंकि शास्त्र में जो लिखा है! कुछ भी लिखा हो, उसको मानने में कोई अड़चन नहीं होती। तुम अब भी द्रोणाचार्य जैसे व्यक्तियों को सम्मान दिए चले जाते हो! और अब भी बड़े मनोभाव से एकलव्य की कथा पढ़ी जाती है और तुम बड़ी प्रशंसा करते हो एकलव्य की!
लेकिन तुम निंदा द्रोण की नहीं करते। जब की निंदा द्रोण की करनी चाहिए। यह आदमी क्या गुरु होने के योग्य है? इसने एकलव्य को इसलिए इनकार कर दिया कि वह शूद्र था, शिष्य बनाने से इनकार कर दिया! और ये सतयुग के गुरु, महागुरु! और इस आदमी की बेईमानी देखते हो!
पहले तो उसे इनकार कर दिया और फिर जब वह जाकर जंगल में इसकी मूर्ति बना कर के धनुर्धर हो गया, तो यह दक्षिणा लेने पहुंच गया। शर्म भी न आई! जिसको तुमने शिष्य ही स्वीकार नहीं किया, उससे दक्षिणा लेने पहुंच गए! और दक्षिणा भी क्या मांगा-दांए हाथ का अंगूठा मांग लिया। क्योंकि इस आदमी को डर था कि एकलव्य इतना बड़ा धनुर्धर हो गया है कि कहीं मेरे शाही शिष्य अर्जुन को पीछे न छोड़ दे! कहीं शूद्र क्षत्रियों से आगे न निकल जाए! इस बेईमान, चालबाज आदमी को तुम अब भी गुरु कहे चले जाते हो! द्रोणाचार्य! अब भी आचार्य कहे चले जाते हो। जगह-जगह इसके, जैसे रावण को जलाते हो, ऐसे द्रोणाचार्य को जलाना चाहिए। रावण ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा? रावण ने किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा।
और एकलव्य की भी मैं प्रशंसा नहीं कर सकता। जब गुरु द्रोण पहुंचे थे लेने अंगूठा, तब अंगूठा बता देना था, देने का सवाल ही नहीं है। यह भी क्या युवा था! पिटाई-कुटाई न करता, चलो ठीक है; इनकी नाक नहीं काटी, ठीक है। लेकिन कम से कम अंगूठा तो बचा सकता था। अगूंठा दे दिया काट कर!
और सदियों से फिर इसकी प्रशंसा की जा रही है। अब भी स्कूलों में पाठ पढ़ाया जा रहा है कि अहा, एकलव्य जैसा शिष्य चाहिए! कौन पढ़ा रहे हैं? तुम्हारे शिक्षक, गुरु, अध्यापक, प्रोफेसर, वे सब पढ़ा रहे हैं-एकलव्य जैसा शिष्य चाहिए! ये सब तुम्हारा अंगूठा काटने के लिए उत्सुक हैं। इनको मौका मिले तो तुम्हारी गर्दन काट लें। जेब तो काटते ही हैं। और ये प्रशंसा कर रहे हैं! और तुम भी...और फिर तुम कहे जाते हो कि युवा हो। "
~ ओशो,
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        कामवासना सिर्फ वासना ही नहीं है, शक्ति का अपव्यय भी है। और जो ऊर्जा हम बाहर फेंक रहे हैं वह ऊर्जा हमें भीतर रिक्त कर जाती है, क्षीण कर जाती है, दीन कर जाती है, और भीतर हमें जड़ कर जाती है।
संवेदना कम हो जाती है। जिन्हें भी ओम की ध्वनि सुननी हो, उन्हें अपनी शक्ति के अपव्यय से बचना चाहिए। क्योंकि जितनी ज्यादा शक्ति भीतर होगी आदोलित, जितनी शक्ति की तरंगें भीतर होंगी, उन तरंगों में वह भीतर की ओंकार की ध्वनि टकराने लगेगी। और वह जो टकराहट है, वह आपको पहले सुनाई पड़ेगी।
ब्रह्मचर्य का मूल्य ब्रह्मचर्य में स्वयं नहीं है। ब्रह्मचर्य का मूल्य तो केवल भीतर शक्ति की एक दीवाल खड़ी करने में है, जिसमें भीतर का ओंकार टकराने लगे और उस टकराहट को हम सुन पाएं। बिना ब्रह्मचर्य के आप दीवालरहित हैं। जैसे कोई घर हो, जिसमें दीवाल न हो। आवाज आप करें, तो लौटकर कभी न आए। निकल जाए, आकाश में खो जाए। ब्रह्मचर्य से हीन व्यक्ति दीवालरहित है। उसके आसपास कोई भी घेरा नहीं है, जिस घेरे में भीतर की ध्वनि टकराकर वापस लौट सके और सुनी जा सके। वह बिना दीवाल का मकान है। उसमें से आवाज गूंजती है और अनंत शून्य में, आकाश में खो जाती है।
ब्रह्मचर्य एक वैज्ञानिक प्रयोग है, जिसके माध्यम से शरीर की पर्त के साथ—साथ शक्ति की पर्त इकट्ठी होती चली जाती है। इस शक्ति की पर्त में पहली बार ओंकार की ध्वनि गूंजती है। और जब इस गंज को हम सुन लेते हैं, तो हमें एक बात तो पक्की हो जाती है कि जिसकी यह गूंज है, वह भीतर छिपा है। फिर इस गज का ही रास्ता पकड़कर हम उस मूल तक पहुंच सकते हैं।
~ ओशो, कठोपनिषद (पांचवां–प्रवचन),
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     ·    ·  ....... प्रेम आत्मा का भोजन है। प्रेम आत्मा में छिपी परमात्मा की ऊर्जा है। प्रेम आत्मा में निहित परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग ...