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Tuesday, 3 January 2017

असली पूजा तो जीवन को जीना है

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असली पूजा तो जीवन को जीना है।बाकी सारी पूजा पाठ आराधना नकली है।

   
तुम्हारी सारी पूजा और आराधना नकली है क्योँ कि असली पूजा तो जीवन जीना है, वह पूजा या आराधना नहीँ है । जीना और क्षण प्रतिक्षण जीना -- और इस प्रमाणिक रूप से जीने मेँ ही कोई एक जानता है कि परमात्मा क्या है, क्योँ कि वह एक जानता है कि वह एक है कौन । 
तुम्हारा परमात्मा का विचार जीने से एक पलायन है । तुम जीने से और प्रेम से डरे हुए हो, तुम मृत्यु से भी भयभीत हो । तुम अपने मन मेँ एक बड़ी कामना सृजित करते हो, एक बहुत दूर की कामना -- जो कहीँ भविष्य मेँ पूरी होगी और तुम उसके साथ सम्मोहित हो जाते हो । तब तुम परमात्मा की पूजा करने लगते हो, और तुम एक नकली परमात्मा की पूजा कर रहे हो ।
असली पूजा छोटी-छोटी चीजोँ से बनती है, न कि शास्त्रोँ के अनुसार बताए क्रिया काण्डोँ से -- ये सारे क्रिया काण्ड तुममेँ यह विश्वास उत्पन्न करने के लिए केवल व्यूह रचनाएं या तरकीबेँ हैँ कि तुम कुछ विशिष्ट चीज अथवा कुछ पवित्र कार्य कर रहे हो । तुम और कुछ भी नहीँ, केवल पूरी तरह से मूर्ख बनाए जा रहे हो । 
तुम नकली परमात्मा सृजित करते हो -- तुम प्रतिमाएं, मूर्तियां और पूजाघर बनाते हो -- तुम वहां जाते हो और वहां मूर्खतापूर्ण चीज़े करते हो, जिन्हेँ तुम यज्ञ, प्रार्थना और इसी तरह की सामग्री कहकर पुकारते हो । तुम अपनी मूर्खता की सजावट कर सकते हो, तुम वेद - मंत्रोँ का पाठ कर सकते हो, तुम बाइबिल पढ़ सकते हो, तुम गिरजाघरों, मंदिरों आदि मेँ जाकर क्रियाकाण्ड कर सकते हो, तुम अग्नि के चारोँ ओर बैठकर गीत और भजन गा सकते हो, लेकिन तुम पूरी तरह से मूर्ख बन रहे हो, यह ज़रा भी धार्मिक होना है ही नहीँ ।
धर्म अर्थात "अनुभूति " धर्म अर्थात " प्रत्यक्ष व्यवहार" । एक सच्चा धार्मिक व्यक्ति दिन- प्रतिदिन, क्षण प्रति क्षण जीता है । वह फर्श पर पोँछा लगाकर उसे साफ करता है, और यही पूजा और आराधना है । एक पुत्र अपने बुजुर्ग माता - पिता की सेवा मेँ लीन है यही पूजा है । एक स्त्री पति के लिए भोजन बनाती है और यही उसकी पूजा है ।
प्रेम से स्नान करने मेँ ही पूजा हो जाती है । पूजा अथवा आराधना करना एक गुण है, उसका स्वयं कृत्य के साथ कुछ लेना - देना नहीँ है, यह तुम्हारी स्थिति और भाव मुद्रा है, जो तुम उस कृत्य मेँ लाते हो ।
यदि तुम किसी पुरूष को प्रेम करती हो और उसके लिए भोजन तैयार करती हो, तो यही तुम्हारी पूजा और आराधना है क्योँकि वह पुरूष ही दिव्य है । प्रेम प्रत्येक व्यक्ति को दिव्य बना देता है, प्रेम दिव्यता के रहस्य को प्रकट करता है । तब वह केवल तुम्हारा पति ही नहीँ रह जाता, वह पति के रूप मेँ तुम्हारा परमात्मा होता है ।
अथवा वह केवल तुम्हारी पत्नी ही नहीँ होती, वह स्त्री के रूप मेँ अंतिम रूप से तुम्हारा परमात्मा होती है, और हमेशा परमात्मा ही बनी रहती है । तुम्हारे बच्चे के रूप मेँ, विशिष्ट रूप मेँ तुम्हारे पास परमात्मा ही आता है 
उसे पहचानो, समझो, यही तुम्हारी पूजा और आराधना होगी । तुम अपने बच्चोँ के साथ केवल खेल रहे हो, और यही पूजा है -- यह उससे कहीँ अधिक महत्वपूर्ण है, जो नकली पूजा तुम मंदिरो मेँ जाकर करते हो ।
तुम्हेँ एक सच्चा और प्रमाणिक जीवन, उत्सव - आनंद के साथ , समग्रता के साथ और सत्यनिष्ठा के साथ जीना है, और तब तुम परमात्मा के बारे मेँ सभी कुछ भूल सकते हो -- क्योँकि प्रत्येक क्षण तुम उससे मिल रहे होगे, प्रत्येक क्षण तुम उससे होकर गुज़र रहे होगे । तब प्रत्येक चीज़ केवल परमात्मा की ही अभिव्यक्ति है । प्रत्येक चीज़ की पहली और पूर्व शर्त परमात्मा ही है -- बिना उसके कुछ भी अस्तित्व मेँ नहीँ हो सकता । 
इसलिए केवल वही विद्यमान है, केवल वही अस्तित्व मेँ है, और शेष सभी कुछ उसी का एक रूप है.!
*ओशो*
*सहज जीवन!*

Monday, 28 November 2016

“प्रेम दगाबाज़ है ! ” – ओशो

तुम एक प्रेम में पड़ गए। तुमने एक स्त्री को चाहा, एक पुरुष को चाहा, खूब चाहा। जब भी तुम किसी को चाहते हो, तुम चाहते हो तुम्हारी चाह शाश्वत हो जाए। जिसे तुमने प्रेम किया वह प्रेम शाश्वत हो जाए। यह हो नहीं सकता। यह वस्तुओं का स्वभाव नहीं। तुम भटकोगे। तुम रोओगे। तुम तड़पोगे। तुमने अपने विषाद के बीज बो लिए। तुमने अपनी आकांक्षा में ही अपने जीवन में जहर डाल लिया।
यह टिकने वाला नहीं है। कुछ भी नहीं टिकता यहां। यहां सब बह जाता है। आया और गया। अब तुमने यह जो आकांक्षा की है कि शाश्वत हो जाए, सदा—सदा के लिए हो जाए; यह प्रेम जो हुआ, कभी न टूटे, अटूट हो; यह श्रृंखला बनी ही रहे, यह धार कभी क्षीण न हो, यह सरिता बहती ही रहे—बस, अब तुम अड़चन में पड़े। आकांक्षा शाश्वत की और प्रेम क्षणभंगुर का; अब बेचैनी होगी, अब संताप होगा। या तो प्रेम मर जाएगा या प्रेमी मरेगा। कुछ न कुछ होगा। कुछ न कुछ विध्‍न पड़ेगा। कुछ न कुछ बाधा आएगी।
ऐसा ही समझो, हवा का एक झोंका आया और तुमने कहा, सदा आता रहे। तुम्हारी आकांक्षा से तो हवा के झोंके नहीं चलते। वसंत में फूल खिले तो तुमने कहा सदा खिलते रहें। तुम्हारी आकांक्षा से तो फूल नहीं खिलते। आकाश में तारे थे, तुमने कहा दिन में भी रहें। तुम्हारी आकांक्षा से तो तारे नहीं संचालित होते। जब दिन में तारे न पाओगे, दुखी हो जाओगे। जब पतझड़ में पत्ते गिरने लगेंगे, और फूलों का कहीं पता न रहेगा, और वृक्ष नग्न खड़े होंगे दिगंबर, तब तुम रोओगे, तब तुम पछताओगे। तब तुम कहोगे, कुछ धोखा दिया, किसी ने धोखा दिया।
किसी ने धोखा नहीं दिया है। जिस दिन तुम्हारा और तुम्हारी प्रेयसी के बीच प्रेम चुक जाएगा, उस दिन तुम यह मत सोचना कि प्रेयसी ने धोखा दिया है; यह मत सोचना कि प्रेमी दगाबाज निकला। नहीं, प्रेम दगाबाज है। न तो प्रेयसी दगाबाज है, न प्रेमी दगाबाज है—प्रेम दगाबाज है।
जिसे तुमने प्रेम जाना था वह क्षणभंगुर था, पानी का बबूला था। अभी—अभी बड़ा होता दिखता था। पानी के बबूले पर पड़ती सूरज की किरणें इंद्रधनुष का जाल बुनती थीं। कैसा रंगीन था! कैसा सतरंगा था! कैसे काव्य की स्फुरणा हो रही थी! और अभी गया। गया तो सब गए इंद्रधनुष! गया तो सब गए सुतरंग। गया तो गया सब काव्य! कुछ भी न बचा।
क्षणभंगुर से हमारा जो संबंध हम बना लेते हैं और शाश्वत की आकांक्षा करने लगते हैं उससे दुख पैदा होता है। शाश्वत जरूर कुछ है; नहीं है, ऐसा नहीं। शाश्वत है। तुम्हारा होना शाश्वत है। अस्तित्व शाश्वत है। आकांक्षा कोई भी शाश्वत नहीं है। दृश्य कोई भी शाश्वत नहीं है। लेकिन द्रष्टा शाश्वत है।
– ओशो
[अष्‍टावक्र महागीता]

Thursday, 24 November 2016

प्रेम मृत्यु है

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प्रेम मृत्यु है 
जिसे उस परम प्यारे की याद बैठ गयी है ---- उसके दिल में दर्द बैठ गया है :;उसके दिल में गहन पीड़ा बैठ गयी , विरह बैठ गया ! खूब काटे चुभेंगे । इन्ही काटो के चुभने के माध्यम से फूलो के पैदा होने की संभावना करीब आती है ।
जीने का स्वाद प्यार के दर्द के बिना मिलता ही नही ।
जीवन के आनंद को , जीवन के स्वाद को हम प्यार की पीड़ा का नाम देते है। प्यार की पीड़ा को ही हम जीवन का स्वाद कहते है ।
लजते जीस्त को हम सोजे जिगर कहते है ,
रहते कल्ब को हम दिदये तर करते है।
और दिल को आराम कहा है ? जब आंखे आंसुओ से भरी हो तब !
भीगी आंख को ही हम हृदय का विश्राम कहते है ।
रोना भी पड़ेगा , पीड़ा भी झेलनी पड़ेगी । यह सब इस रास्ते पर मिलने वाली भेटे है ।
--- भेट याद रखना इसको पीड़ा मत समझना , ये कांटे प्रतिपल मंजिल के करीब ला रहे है ।
दर्द बढ़ने से जो मिलती है हंमे इक तस्की
जिसने प्रेम किया है , जिसने यह पीड़ा सही है ---- वह कहेगा दर्द बढ़ने से जो मिलती हमें है इक तस्की ।
एक शान्ति मिलती है , एक राहत मिलती है । दर्द बढ़ने से ! क्योकि दर्द बढ़ता है उतना प्यारे के करीब आना होने लगता है । उसके करीब आने के कारण ही दर्द बढ़ता है ।
हम इसे अपनी दुआओं का असर कहते है ।
भीतर तो दर्द होता है भक्त के , बड़ी पीड़ा होती है , गहन पीड़ा होती है , आग की लपटें जलती होती है । क्योंकि मौत रोज - रोज करीब आती है । लेकिन बाहर भक्त बड़ा मस्त होता है ।
मस्तियों हाल जिसे कहते है दुनिया वालो ,
तेरे दीवाने इसे तेरी नजर कहते है ।
बस तेरी एक नजर हो जाती है तो सब दुख मिट जाते है ।
तेरी एक नजर हो जाती है तो सब कांटे भूल जाते है ।
लंबी -लंबी प्रतिक्षाये , यात्राओं के कष्ट, सब विस्मृत हो जाते है ।
दुनिया के लोग जिसे मस्ती कहते है, तेरे दीवाने इसे तेरी नजर कहते है ।
एक ही बात है जल्वा कही कहते है इसे ,
कही दीदारे खुदी हुस्ने नजर कहते है ।
*** झुक आयी बदरिया सावन की,
***** भगवान श्री......

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· . प्रेम आत्मा का भोजन है।

     ·    ·  ....... प्रेम आत्मा का भोजन है। प्रेम आत्मा में छिपी परमात्मा की ऊर्जा है। प्रेम आत्मा में निहित परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग ...