Wednesday, 15 February 2017

चीनी चित्रकार

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सुनी है मैंने एक छोटी सी कहानी, वह मैं आपसे कहूं। सुना है मैंने कि एक ईरानी बादशाह के दरबार में एक चीनी चित्रकार ने निवेदन किया कि मैं चीन से आया हूं। बहुत बड़ी कला का धनी हूं। चित्र बना सकता हूं ऐसे, जैसे कि आपने कभी न देखे हों। सम्राट ने कहा, जरूर बनाओ। लेकिन हमारे दरबार में चित्रकारों की कमी नहीं है और बहुत अनूठे चित्र मैंने देखे हैं। उस चीनी चित्रकार ने कहा तो मैं प्रतियोगिता के लिए भी तैयार हूं।
जो श्रेष्ठतम कलाकार था सम्राट के दरबार का, वह प्रतियोगिता के लिए चुना गया। और सम्राट ने कहाकि पूरी शक्ति लगाना है, यह साम्राज्य की प्रतिष्ठा का सवाल है। एक परदेशी तुम्हें हरा न जाए। छह महीने का उन्हें समय मिला था।
ईरानी चित्रकार बड़ी मेहनत में लग गया। दस—बीस सहयोगियों को लेकर उसने एक भवन की पूरी दीवार को चित्रों से भर डाला। उसकी मेहनत की खबर दूर—दूर तक पहुंच गई। लोग दूर—दूर से उसकी मेहनत को देखने आने लगे। लेकिन उससे भी ज्यादा चमत्कार: की बात तो यह थी कि वह चीनी चित्रकार ने कहा कि मुझे किसी उपकरण की जरूरत नहीं और न रंगों की कोई जरूरत है। सिर्फ मेरा इतना ही आग्रह है कि जब तक चित्र पूरा न बन जाए तब तक मेरी दीवार के सामने से पर्दा नहीं उठाया जा सके।
वह रोज अपने पर्दे के पीछे चला जाता। सांझ को थका—मादा लौटता, माथे पर पसीने की बूंदें होतीं। लेकिन बड़ी कठिनाई और बड़ी हैरानी और बड़ी अचंभे की बात यह थी कि वह न तो तूलिका ले जाता, न रंग ले जाता पर्दे के पीछे। उसके हाथों में रंग के कोई निशान न होते। उसके कपड़ों पर रंग के कोई दाग न होते। उसके हाथ में कोई तूलिका न होती। सम्राट को शक होने लगा कि वह पागल तो नहीं है! क्योंकि प्रतियोगिता होगी कैसे? लेकिन छह महीने प्रतीक्षा करनी जरूरी थी। शर्त पूरी करनी जरूरी थी।
छह महीने बडी मुश्किल से कटे। दूर—दूर तक ईरानी चित्रकार के चित्रों की खबर पहुंवी। साथ ही यह खबर भी पहुंची कि एक पागल प्रतियोगी भी है, जो बिना किसी रंग के प्रतियोगिता कर रहा है। छह महीने लोग ऐसी आतुरता से प्रतीक्षा किए कि जिसका कोई हिसाब नहीं। वह छह महीने बाद पर्दा उठने को था।
सम्राट गया। ईरानी चित्रकार के चित्र देखकर वह दंग हो गया। बहुत चित्र उसने जीवन में देखे थे। लेकिन नहीं, ऐसा श्रम शायद ही कभी किया गया हो! फिर उसने चीनी चित्रकार से कहा। चीनी चित्रकार ने अपनी दीवार के सामने का पर्दा हटा दिया। सम्राट तो बहुत हैरान हो गया। ठीक वही चित्र! जो ईरानी चित्रकार ने बनाया था, वही चित्र चीनी चित्रकार ने भी बनाया था। पर एक और खूबी थी कि वह चित्र दीवार के ऊपर नहीं, दीवार के भीतर बीस फीट अंदर दिखाई पड़ता था। सम्राट ने पूछा, तुमने किया क्या है! क्या जादू है?
उसने कहा, मैंने कुछ किया नहीं। मैं सिर्फ दर्पण बनाने में कुशल हूं। तो मैंने दीवार को दर्पण बनाया। वह छह महीने दीवार को घिस—घिसकर मैंने दर्पण बनाया। और जो चित्र आप देख रहे हैं दीवार में, वह तो ईरानी चित्रकार का ही है सामने की दीवार पर। मैंने सिर्फ दीवार दर्पण बनाई है।
जीत गया वह प्रतियोगिता। क्योंकि दर्पण में झलककर वही ईरानी चित्र इतना गहरा हो उठा, जैसा वह खुद स्वयं में नहीं था। क्योंकि ईरानी चित्र तो दीवार के ऊपर था। दर्पण में जाकर वह भीतर गहरे हो गया। डेप्थ, थी डायमेंशनल हो गया। ईरानी चित्र तो टू डायमेंशन में था, दो आयाम में था। उसमें गहराई न थी। चीनी चित्रकार का चित्र तीन डायमेंशन में हो गया, उसमें गहराई भी थी।
सम्राट ने कहा कि तुमने पहले क्यों न कहा कि तुम सिर्फ दर्पण बनाना जानते हो! उस चीनी चित्रकार ने कहा कि मैं कोई चित्रकार नहीं हूं फकीर हूं। उसने कहा, और मजे की बात है। पहले तुमने यह न बताया कि तुम दर्पण बनाते हो, अब तुम बताते हो कि तुम फकीर हो! तो फकीर को दर्पण बनाने से क्या प्रयोजन? उस चीनी चित्रकार ने कहा कि मैंने अपने को दर्पण बनाकर जो चित्र देखा जगत का, तब से मैं दर्पण ही बनाता हूं। जैसे इस दीवार को मैंने घिस—घिसकर दर्पण कर दिया है, ऐसे ही मैंने अपने को घिस—घिसकर भी दर्पण कर लिया है। और मैंने इस जगत की जो सुंदर प्रतिमा फिर अपने में देखी है, वैसी बाहर कहीं भी नहीं है। लेकिन जिस दिन मैं दर्पण बन गया, उस दिन मैंने सारे जगत को अपने में समाया हुआ देखा और जाना। सब भूत मेरे भीतर समा गए।
जिस दिन हमारा हृदय दर्पण की तरह बनता है, उस दिन हम प्रभु को देख पाते हैं, समग्रीभूत अपने ही भीतर। और जिस दिन हम यह देख पाते हैं, उसी दिन सारा जगत भी दर्पण बन जाता है। फिर हम अपने को भी प्रतिपल सब जगह देख पाते हैं। लेकिन जगत को दर्पण नहीं बनाया जा सकता। बनाया तो जा सकता है दर्पण स्वयं को ही। इसलिए यात्री — साधना का यात्री — अपने को ही दर्पण बनाने से शुरू करता है।
ओशो , ईशावास्‍य उपनिषाद -5

God got a thing about you

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God is beyond all experience. You cannot experience God because he is not separate from you. You can live God, you can be God, but you cannot experience him. We can experience things only when they are separate from us. You cannot see yourself, and God is your innermost core — you cannot see God either.
So people who search for God as if God is an object are on a wrong journey from the very beginning. They will be frustrated, and out of frustration they can start creating hallucinations too. Because of the frustration the mind starts giving consolation prizes: the mind gives you hallucinatory experiences.
If you are a Hindu you see Krishna standing before you, and that is just an hallucination. If you are a Christian you see Christ. The Christian never sees Krishna, the Hindu never sees Christ; the Mohammedan is blissfully unaware of both. You see only that which you are projecting. Because down the ages God has been thought of as a person, hallucinations become possible. Because he was thought of as something that can be experienced, people went on wrong journeys and wasted their lives
God cannot be experienced, cannot be searched for, cannot be seen, because you are it. You are already it, so what is needed is not to search; all that is needed is to start celebrating. You are God! There is no need to postpone your celebration even for a single moment, because in the next moment also you will be God, as much as you are right now. Yesterday also you were as much a God as you are right now or will ever be. You are the same God always. Just a little daring is needed to celebrate it, a little daring to accept this tremendous truth of “I am God!”
It is very difficult because the so-called saints have been teaching you that you are a sinner, that you are unworthy, that you will be thrown into hellfire — that’s where you belong. How can you suddenly believe that you are a God? It seems outrageous but it is the truth.
To recognize yourself as God does not mean that you are God and others are not God. To recognize yourself as God means that everything is divine, even your enemy. Not only is Jesus God but Judas too! That is very shattering… that is very difficult. Not only is the beautiful person God, but the ugliest, he too is God because nothing else exists. God is synonymous with existence.
My approach is that we are not searching for experiences here. We are trying to know the one who experiences all experiences. Our search is for the witness. Who is this observer? Who is this consciousness? Sometimes it feels sad, sometimes it feels happy; sometimes it is so high, flying in the sky, and sometimes so down. Who is this watcher of all these games? — high and low, happy, unhappy, in heaven and hell. Who is this watcher?
To know this watcher is to know God. And you are already it — just a little awakening is needed… no search but only awakening".
Osho, God got a thing about you

BELOVED OSHO,

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I ALWAYS HEAR YOU SAYING NICE THINGS ABOUT THE WOMEN. COULD YOU NOT STICK
UP FOR THE MEN ONCE IN A WHILE?
Anand Heeren, it is a very difficult question. I could not sleep the whole night. I tried and tried hard to find something nice about men, but I have to admit to you there is nothing that can be said. You can see for yourself.
An interviewer for a ladies' magazine is questioning a famous British general about his sex life.
"Excuse me, sir," she begins, "but can you recall the last time you had relations with your wife?"
His upper lip stiffens for a moment and then he says, "Yes, of course I can, it was nineteen forty-five."
After a moment's silence the woman says, "That was a long time ago."
The general glances at his watch and says, "Not so long really. It is only twenty-one forty-nine."
Hymie Goldberg sends his eldest son to India on a cultural exchange, but is very upset when he comes back as a sannyasin. Not knowing what else to do, he phones his old friend, Moishe Finkelstein, and tells him the sad news.
"Funny you should say that," exclaims Moishe. "My son went to Poona and he too came back a sannyasin." The two old friends decide to go to the rabbi for help.
When they have told the rabbi their unhappy tale, the rabbi scratches his head and replies, "Funny you should say that. My son also went to Poona and he came back a sannyasin. We had better go to the synagogue and pray to God for advice."
So the three old Jews go down to the synagogue and pray fervently for guidance. Suddenly there is a clap of thunder and a voice from above says, "Funny you should say that, my son also went to Poona and became a sannyasin: Swami Jesus Christ."
Man is a funny thing. If any of you find anything nice about man, please inform me. I accept my failure absolutely.
Osho Sat Chit Anand

दो व्यक्तियोँ की तुलना न करेँ

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जब तक दुनिया में हम एक आदमी को दूसरे आदमी से कम्पेयर करेंगे, तुलना करेंगे तब तक हम एक गलत रास्ते पर चले जाएंगे। वह गलत रास्ता यह होगा कि हम हर आदमी में दूसरे आदमी जैसा बनने की इच्छा पैदा करते हैं; जब कि कोई आदमी किसी दूसरे जैसा न बना है और न बन सकता है।
राम को मरे कितने दिन हो गए, या क्राइस्ट को मरे कितने दिन हो गए? दूसरा क्राइस्ट क्यों नहीं बन पाता और हजारों-हजारों क्रिश्चिएन कोशिश में तो चौबीस घंटे लगे हैं कि क्राइस्ट बन जाएं। और हजारों हिंदु राम बनने की कोशिश में हैं, हजारों जैन, बुद्ध, महावीर बनने की कोशिश में लगे हैं, बनते क्यों नहीं एकाध? एकाध दूसरा क्राइस्ट और दूसरा महावीर पैदा क्यों नहीं होता? क्या इससे आंख नहीं खुल सकती आपकी? मैं रामलीला के रामों की बात नहीं कह रहा हूं, जो रामलीला में बनते हैं राम। न आप समझ लें कि उनकी चर्चा कर रहा हूं, कई लोग राम बन जाते हैं। वैसे तो कई लोग बन जाते हैं, कई लोग बुद्ध जैसे कपड़े लपेट लेते हैं और बुद्ध बन जाते हैं। कोई महावीर जैसा कपड़ा लपेट लेता है या नंगा हो जाता है और महावीर बन जाता है। उनकी बात नहीं कर रहा। वे सब रामलीला के राम हैं, उनको छोड़ दें। लेकिन राम कोई दूसरा पैदा होता है?
यह आपको जिंदगी में भी पता चलता है कि ठीक एक आदमी जैसा दूसरा आदमी कहीं हो सकता है? एक कंकड़ जैसा दूसरा कंकड़ भी पूरी पृथ्वी पर खोजना कठिन है, एक जड़ कंकड़ जैसा-यहां हर चीज यूनिक है, हर चीज अद्वितीय है। और जब तक हम प्रत्येक की अद्वितीय प्रतिभा को सम्मान नहीं देंगे तब तक दुनिया में प्रतियोगिता रहेगी, प्रतिस्पर्धा रहेगी, तब तक दुनिया में मार-काट रहेगी, तब तक दुनिया में हिंसा रहेगी, तब तक दुनिया में सब बेईमानी के उपाय करके आदमी आगे होना चाहेगा, दूसरे जैसा होना चाहेगा। और जब हर आदमी दूसरे जैसा होना चाहता है तो क्या फल होता है? फल यह होता है-अगर एक बगीचे में सब फूलों का दिमाग फिर जाए या बड़े-बड़े आदर्शवादी नेता वहां पहुंच जाएं या बड़े-बड़े शिक्षक वहां पहुंच जाएं और उनको समझाएं कि देखो, चमेली का फूल चंपा जैसा हो जाए, चमेली का फूल चंपा जैसा, चंपा का फूल जुही जैसा, क्योंकि देखो, जुही कितनी सुंदर है...और सब फूलों को अगर पागलपन आ जाए, हालांकि आ नहीं सकता! क्योंकि आदमी से पागल फूल नहीं है।
आदमी से ज्यादा जड़ता उनमें नहीं है कि वे चक्कर में पड़ जाएं। शिक्षकों के, उपदेशकों के, संन्यासियों के, साधुओं के, आदर्शवादियों केचक्कर में कोई फूल नहीं पड़ेगा। लेकिन फिर भी समझ लें, कल्पना कर लें कि कोई आदमी पहुंच जाए और समझाए उनको और वे चक्कर में आ जाएं और चमेली का फूल चंपा का फूल होने लगे तो क्या होगा उस बगिया में। उस बगिया में फूल फिर पैदा नहीं होंगे, उस बगिया में फिर फूल पैदा ही नहीं हो सकते। उस बगिया में फिर पौधे मुरझा जाएंगे, मर जाएंगे। क्यों? क्योंकि चंपा लाख उपाय करे तो चमेली नहीं हो सकती, वह उसके स्वभाव में नहीं है, वह उसके व्यक्तित्व में नहीं है, वह उसकी प्रकृति में नहीं है। चमेली तो चंपा हो ही नहीं सकती। लेकिन क्या होगा? चमेली होने की कोशिश में वह चंपा भी नहीं हो पाएगी। वह जो हो सकती थी, उससे भी वंचित रह जाएगी।

मुल्ला नसरुद्दीन और पादरी

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मुल्ला नसरुद्दीन के पड़ोस में एक चर्च था। और चर्च का पादरी कभी-कभी नसरुद्दीन को शिक्षण दिया करता था। देखता था उसका जीवन, तो कभी-कभी समझाता था। एक दिन नसरुद्दीन ने उससे कहा कि आप ठीक ही कहते हैं, मैंने अब पक्का कर लिया है कि आज जाकर मैं अपनी पत्नी से क्षमा मांग लूंगा, और अब किसी स्त्री की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखूंगा! बहुत हो गया। और आप ठीक ही कहते थे, लेकिन मैं माना नहीं। यह मन की दौड़ थी, वासना थी, चलती रही। लेकिन अब उम्र भी हो गयी। तो आज जाकर पत्नी से क्षमा मांग लेता हूं। सब कन्फेशन कर लूंगा कि मैं उसे धोखा दे रहा हूं।
दूसरे दिन सुबह पादरी प्रतीक्षा करता रहा कि कब नसरुद्दीन घर से निकले। नसरुद्दीन बड़ी शान से, बड़ी ताजगी से जोर से कदम रखता हुआ चर्च के पास से निकला। बड़ा प्रसन्न था। तो पादरी ने कहा, “मालूम होता है, नसरुद्दीन, पत्नी ने तुम्हें क्षमा कर दिया!’
नसरुद्दीन ने कहा कि नहीं, पत्नी ने क्षमा तो नहीं किया, लेकिन अभी बात न करो। दो-चार दिन बाद!
पादरी ने कहा, लेकिन, “ऐसा क्या मामला हुआ है? प्रसन्न तुम बहुत दिखते हो?’
नसरुद्दीन ने कहा, “मैंने अपनी पत्नी को कहा कि मैं तुझे धोखा दे रहा हूं। एक दूसरी स्त्री से मेरा संबंध है। तो वह बड़ी बेचैन हो गयी और कहने लगी, उसका नाम बताओ। तो नाम बताना तो उचित नहीं था, क्योंकि उस दूसरी स्त्री की इज्जत का भी सवाल है; उसके पति का भी सवाल है; उसके बच्चों का भी सवाल है। तो मैंने कहा कि नाम तो मैं नही बता सकूंगा, माफी मांगता हूं, क्षमा कर दे। तो पत्नी नाराज हो गयी। उसने कहा कि जब तक तुम नाम नहीं बताओगे, मैं क्षमा न करूंगी। और फिर कहने लगी, अच्छा, अगर तुम नहीं बताते तो मैं खुद ही खयाल कर लेती हूं। तुम पादरी की पत्नी के प्रेम में तो नहीं हो? और जब मैं चुप रहा तो उसने कहा कि नहीं-नहीं, पादरी की बहन! और जब मैं फिर भी चुप रहा तो उसने कहा कि नहीं-नहीं, अब तो पक्का है कि तुम पादरी की लड़की से!
मैं चुप ही रहा।
तो पादरी ने कहा, “लेकिन इससे तुम इतने प्रसन्न क्यों हो?’
तो नसरुद्दीन ने कहा कि और तो कुछ हल न हुआ, बट शी हैज गिवन मी थ्री न्यू कान्टैक्ट्स। और अभी अब बीच में पड़ो मत!
मन फिर गतिमान हो गया। अब तीन नये पते उसने और बता दिये। इन तीन स्त्रियों का खयाल ही नहीं था नसरुद्दीन को।
महावीर वाणी, भाग-२,
ओशो

Tuesday, 7 February 2017

बिल्ली मत पालना


एक बार एक महात्मा मरने के करीब था। उसने अपने प्रिय शिष्य को अपने पास बुलाया और कहने लगा। देख तू मेरी एक बात मान जो चाहे करना पर बिल्‍ली मत पालना। ये में अपने जीवन भी निचोड़ तुझे दिये जा रहा हूं। ये तेरी जीवन का सूत्र है।
शिष्‍य ने कहा पर गुरूदेव में इस सूत्र का अर्थ समझ नहीं पाया। पर गुरु के पास समय कम था सो वह स्‍वर्ग सीधार गये। अब युवक उस सूत्र में उलझा रह गया। कितने शास्त्र पढ़े पर उसका हल नहीं मिला। अब गुरु की बात को झूठ तो मान नहीं सकता। उपनिषद, पुराण, सभी धार्मिक ग्रंथों में टटोल लिया पर उस गूढ सूत्र का रहस्‍य नहीं मिला तो नहीं मिला। पर शिष्‍य की समझ में ये नहीं आ रहा था की बिल्‍ली का अध्‍यात्‍म से क्‍या रहस्‍य हो सकता है। और फिर में बिल्‍ली क्‍यों पालू ही क्‍यों? बिल्‍ली के पालने में ऐसा क्‍या है, नाहक लोग हंसेंगे। कुत्‍ते के साथ रहोगे तो आधे कुत्‍ते तो तुम खुद ही हो जाओगे। अब में क्‍यों ऐसा चुनाव कुरू। बात आई गई हो गई। थोड़ दिनों में युवक उस बात को ही भूल गया। सोचा गुरु मरते समय सठिया गया था।
तब वह युवक जंगल में एक कुटिया बना कर ध्‍यान करने लगा। अब जंगल की कुटिया कोई सुरक्षित जगह तो थी नहीं। वहाँ पर आस पास में चूहे बहुत थे। युवक के पास पहने के लिए दो जोड़ा कपड़े थे, उन्‍हें भी वह चूहे काटने लगे। वह परेशान हो गया। गांव में जब भिक्षा मांगने के लिए जाता तो लोग पूछते महाराज कपड़ों में छेद क्‍यों हो गया। तब उस युवक को बड़ी शर्म आती। अब वह जब भी कपड़े धोकर सुखाता,साथ एक मोटा सोटा ले कर बैठ जाता जिससे की चूहे उन्‍हें काटने न पाये। रात भी कपड़ों की सुरक्षा के लिए उसे बार-बार जागना पड़ता।
आखिर में तंग आ कर उसने गांव के लोगो से कहां की मेरे झोंपड़े के आस पास चूहे बहुत है। बताओ क्‍या करे। तब एक बुजुर्ग ने कहां करना क्‍या है। तुम एक बिल्‍ली को क्‍यों नहीं पाल लेते। वह सारे चूहों को वहां से भगा देगी या खा जायेगी। युवक को यह बात पसंद आई और वह गांव में से एक बिल्‍ली को मांग कर ले गया। तब भी उसे गुरु की बात याद नहीं आई। कि गुरु कह गये थे कि बेटा सब करना पर बिल्‍ली को मत पालना।
बिल्ली ने तो महीने भर में सारे चूहे सफाचट कर दिये। अब उसे बड़े चेन की नींद आती। उसकी सारी की सारी फिक्र बिल्‍ली ने अपने कंधे पर ले ली। पर महीने बाद जब चूहे खत्‍म हो गये तब बिल्‍ली भूखी रहने लगी। वह गांव में जाता तो भिक्षा के साथ उस बिल्‍ली के लिए दुध भी माँगता। तब एक दो दिन तो लोग बागों ने दे दिया। पर दूध उनके बच्‍चो के लिए भी कम ही था।
अब साधु की बिल्ली के लिए कहां से दे। साधु परेशान होने लगा। लोगों उसे प्रेम और श्रद्धा की नजर से देखते थे। अब गांव वाले कहने लगे महाराज आप ऐसा क्‍यों नहीं करते एक गाय को पाल  लो। आस पास चारा तो बहुत है। आपको क्‍या करना है। श्‍याम को दूध निकाल लेना। आप दोनों का बड़े मजे से गुजर हो जायेगा। बात साधु को जँचीं। वह किसी किसान के यहां से बूढ़ी गाय मांग कर ले गया। रोज-रोज दूध देने से बेहतर यही था कि एक गाय ही दे दि जाये। अब वह दूध भी कितना देती थी। पर साधु के पा जाकर उसने खुब दुध देना शुरू कर दिय1 उस के साथ जो बछड़ा था वह भी बड़ा हो गया।
कुछ ही दिनों में उसने एक और बच्‍चे को जनम दिया। आब साधु के पास चार प्राणी हो गये। एक बिल्‍ली। और गाय और उसके बछड़े। उसे उनके लिए एक झोपडी भी बनाना पडा। चारे की कमी के कारण। वह आस पास की खाली जमीन पर कुछ तरा-सरसो बोने लगा। सारा दिन जमीन को साफ करता। पानी देता। काटता। उसे ध्‍यान के लिए समय ही नहीं मिलता। लोगो ने कहा की थोड़ा सा गेहूँ भी क्‍यों नहीं बो देते फिर तुम्‍हें भिक्षा की भी जरूरत नहीं रहेगी। वैसे भी अब भी वह भिक्षा मांगने जाने की सोचता पर जा नहीं पाता था। उसका अपना ही काम कितना हो गया था। कहीं गोबर उठना,कहीं बछड़े का नहलाना। पूरा झमेला हो गया साधु के सर पर।
रात-रात भर खेतों की रखवाली करन। जंगली जानवर उन्‍हें खराब न कर दे। उसके चारों और कांटे की झंडियां लगाई। अब वह थक गया ओर फिर एक गांव में गया और राय मांगने लगा। की तुमने अच्‍छी राय दि पर। अब मेरा काम बहुत बढ़ गया है। ध्‍यान तपश्चर्या भी नहीं कर पाता। पहले भिक्षा मांगता था। और दिन भर ध्‍यान करता था। अब तो चौबीस घंटे खेतों के या गाय के पीछे ही लगे रहना पडा है। अब एक गाय की दस हो गई। मेरा पूरा शरीर थक जाता है। तुम कुछ राय दो अब क्‍या करू।
गांव वालों ने कहा, बात तो आपकी ठीक है। पर तुम अब एक काम कर सकते हो। गांव में एक नवयुवक मर गया। उसकी पत्‍नी बेचारी विधवा है। बहुत ही नेक और शरीफ है। अब उसका कोई नहीं है। क्‍यों न तुम उस विधवा को साध्वी बना कर अपने पास रख लो। वह आपके पचास काम करेगी। एक से दो भले होगें। काम भी आधा-आधा बट जायेगा। शरीर से वह बहुत मजबूत है। आपको तो काम करने ही नहीं देगी। खेतीबाड़ी में साथ जायेगी। और आप जब थक होगें तो आपके पैर भी दबा देगी। भोजन बना देगी। घर की सफाई कर देगी। किसान की बेटी है। मेरे ख्‍याल से आप अपनी तपश्चर्या करना और वह आपके सारे काम को देख लेगी।
साधु को बात जँचीं। और फिर जो होना था सो हुआ। फिर विधवा से धीर-धीरे प्रेम हो गया। विधवा पैर भी दबाए, रोटी भी खिलाएं। स्‍नान भी करवाए। अब सारा दिन का संग साथ। तो धीरे-धीरे एक दूसरे से लगाव हो गया। फिर दोनों ने एक दिन गांव के लोगो से राय ली की अब क्‍या किया जा सकता है। हम लोगो में प्रेम हो गया है। लोगो ने कहा ये तो आपका बड़ा पन है। आपकी महानता है। आपने हमें बताया। नहीं तो हमे पता ही नहीं चलता। सो भलाई अब इसी में है कि आप पति पत्‍नी बन जाये। सो लोगों ने साधु की शादी करा दी। देखते ही देखते दो तीन बच्‍चे हो गये। फिर बच्‍चों को पढ़ाना लिखाना, उनकी शादी विवाह करना। बात बढ़ती ही चली गई। एक बिल्ली से शुरू हो कर बात इतनी दूर चली गयी। की बल्‍ली की बात तो वह युवक साधु भूल ही गया। जब वह मरने लगा तो तब उसे अपने गुरु की बात याद आई लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
मरते गुरू ने जो सुत्र शिष्‍य को दिया था। वह उसकी समझ में नहीं आया। समझ में आ भी नहीं सकता। हम अनुभव से भी समझ जाये तो काफी बुद्धिमान…पर हम अनुभव से भी नहीं समझ पाते। गुरु ने कहां था। बेटा बिल्‍ली भर मत पालना। कैसी भूल हो गई। पूरा जीवन बेकार चला गया। तब साधु ने सोचा। मैने गुरु की बात न मान कर कितनी बड़ी गलती की है। अब ये बात अगले जन्‍म में याद रखूंगा…..तब हम यह मान ले कि वह रख सकेगा। जब इस जन्‍म में उसे याद नहीं रहा था तो पिछले जन्‍म की कोई संभावना नहीं है।
मन जब तक साथ है तो बिल्‍ली नहीं पालेगे तो कुत्‍ता पाल लोगे। इससे फर्क कुछ पड़ने वाला नहीं है। कुछ भी पालो। मन जब तक होगा, खेती न करोगे तो दुकान चलाओग। फिर वह दुकान पूजा की ही क्‍यों न हो। यज्ञ हवन की ही क्‍यों न हो। मन कुछ न कुछ करवाएगा। मन बिना कर्ता हुए नहीं रह सकता। मन के प्राण ही उसके कर्ता होने में है।
– ओशो
[कहे होत अधीर—पलटू]

बुद्धि का खेल

बुद्धि में तो जो भी आया है बाहर से आया है। किताब पढ़ी, किसी को सुना,किसी से बात की, स्कूल—विश्वविद्यालय सीखा, वही सब तुम्हारी बुद्धि में भरा है। बुद्धि तो एक कंप्यूटर है जिसमें बाहर से सूचनाएं डाली जाती हैं। बुद्धि तो एक टेपरिकॉर्ड है, एक ग्रामोफोन रेकॉर्ड है, जिसमें बाहर से सूचनाएं भर दी जाती हैं फिर बुद्धि उसे दोहराती रहती है।
और बड़ा मजा है। हम इसी को बड़ा मूल्य देते हैं। जो जितना अच्छा ग्रामोफोन रेकॉर्ड है उसको हम कहते हैं उतना ही बुद्धिमान। विश्वविद्यालय उसे स्वर्णपदक देते हैं। और उसने प्रमाण क्या दिया है बुद्धि का? एक ही प्रमाण दिया है कि जो भी साल—भर शिक्षकों ने उसकी खोपड़ी में भरा था, उसने परीक्षा की कॉपी पर उसका वमन कर दिया,उल्टी कर दी। परीक्षा की कॉपी पर ठीक उसने वैसा ही का वैसा, बिना पचा——। पच जाता तो वमन कैसे करता? सम्हाले रहा, सम्हाले रहा, सम्हाले रहा, फिर सारी परीक्षा की कॉपी गंदी कर दी। स्वर्णपदक मिल गया उसको। उसका बड़ा सम्मान है।
उसने कौन—सी कुशलता दिखाई? यह कोई बुद्धि की कुशलता है? हां, इतना कहा जा सकता है, उसके पास अच्छी स्मृति है। मगर स्मृति और बुद्धि बड़ी भिन्न बातें हैं। मनोवैज्ञानिक जिसको बुद्धि का माप कहते हैं,इंटेलिजंस कोशिएंट कहते हैं, वह वस्तुतः बुद्धि का माप नहीं है, केवल स्मृति का माप है। और याददाश्त का अच्छा होना और बुद्धि का अच्छा होना पर्यायवाची नहीं हैं। अक्सर ऐसा होता है कि जिनकी याददाश्त बहुत अच्छी होती है उनके पास बुद्धि जैसी चीज नहीं होती। और जिनके पास बुद्धि जैसी चीज होती है उनकी याददाश्त बहुत अच्छी नहीं होती।
ओशो..

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     ·    ·  ....... प्रेम आत्मा का भोजन है। प्रेम आत्मा में छिपी परमात्मा की ऊर्जा है। प्रेम आत्मा में निहित परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग ...