Monday, 29 June 2015

Osho rahimandhaga prem ka

सोमरस

जो श्रेष्‍ठतम हे, उसे वेदों ने सोमरस कहा है। सदिया हो गई, न मालूम कितने लोग सोमरस की तलाश में रहे है। वैज्ञानिक हिमालय की खाइयों में, पहाड़ियों में, सोमरस किस पौधे से पैदा होता था, उसकी अनथक अन्वेषण करते रहे है। अब तक कोई जान नहीं पाय कि सोमरस कैसे पैदा होता था? सोमरस क्‍या था?
वे जान भी नहीं पाएंगे। सोमरस स्‍थूल बात नहीं है। सोमरस तो ऋषियों के पास, उनकी सन्‍निधि में, उनके मौन में, उनके ध्‍यान में लय वद्ध हो जाने से मिलता था। वह किन्‍हीं पौधों से नहीं मिलता था। वह किन्‍हीं फलों से नहीं मिलता। वह किन्‍हीं फूलों से नहीं मिलता। वह तो जिनको चेतना का कमल खिला है, उनसे जो उठती है सुवास, उनसे जो गंध उठती है। उनसे जो आलोक बिखरता है, उससे मिलता है।
सोम चंद्रमा का नाम है। साधारणत: व्‍यक्‍ति सूर्य का अंश होता है। साधारणत: सभी सूर्यवंशी होते है। सिर्फ बुद्ध पुरूषों को छोड़ कर। सूर्यवंशी होने का अर्थ है कि तुम्‍हारे भीतर ऊर्जा उत्‍तप्‍त है। जैसे बुखार में हो; विक्षिप्‍त है। इस सूर्य की उत्‍तप्‍त ऊर्जा को जब कोई व्‍यक्‍ति अपने भीतर शांत कर लेता है। जब काम राम में रूपांतरित होता है। तब तुम चंद्र वंशी हो जाते हो। तब तुम सूर्य से हटते हो, चंद्रमा की तरफ तुम्‍हारी यात्रा शुरू होती है। और एक ऐसी पूर्ण घड़ी भी आती है जीवन में, अपूर्व घड़ी भी आती है—रहस्‍य की, अनुपम अनुभव की—जब तुम चंद्र हो जाते हो।
इसी बात को बुद्ध के जीवन में प्रतीक रूप से कहा गया है। गौतम बुद्ध का जन्‍म पूर्णिमा की रात को हुआ। उन्‍हें बुद्धत्‍व भी प्राप्‍त हुआ पूर्णिमा की रात्रि को। और उसी पूर्णिमा की रात्रि को बुद्ध की मृत्‍यु भी हुई। उनका देह त्‍याग भी उसी महा की पूर्णिमा, वहीं पूर्णिमा को। जैसे जन्‍म, जीवन और मृत्‍यु सब एक बिंदु पर आकर मिल गए। सब पूर्णिमा पर आकर मिल गए। जैसे चंद्रमा पुर्ण हुआ। बुद्ध के पास बैठ कर जिन्‍होंने पिया। उन्‍होंने ही जाना की सोमरस क्‍या है? बुद्ध के कमल से जो गंध उठी, उनके चंद्र से जो किरणें फैली, उसकी पीने की क्षमता जुटाने वालों को ही पता चलेगा। वहीं सोमरस ऋषियों के संग बैठ कर उन शिष्‍यों ने जाना। जो उनके इतने पास आते थे उनके लिए ही सूक्ष्‍म रसों की प्रक्रिया शुरू हो जाती थी। लेकिन सोमरस तभी पिलाया जा सकता है। जब किसी का पात्र तैयार हो। ये केवल शिष्‍य ही पी सकते है।
सोमरस से सुंदर और कोई नाम नहीं है। मैं यहां तुम्‍हें सोमरस पिला रहा हूं। पीओ जी भर कर कंजूसी मत करना जरा भी।

ओशो ,प्रवचन-7, रहिमन धागा प्रेम का.

Osho how to live happy

एक सादगी भरा व्‍यक्‍ति जान लेता है कि प्रसन्‍नता जीवन का स्‍वभाव है। प्रसन्‍न रहने के लिए किन्‍हीं कारणों की जरूरत नहीं होती। बस तुम प्रसन्‍न रह सकते हो। केवल इसीलिए कि तुम जीवित हो। जीवन प्रसन्‍नता है जीवन आनंद है लेकिन ऐसा संभव होता है केवल एक सहज सादे व्‍यक्‍ति के लिए ही। वह आदमी जो चीजें इकट्ठी करता रहता है, हमेशा सोचता है कि इन्‍ही चीजों के कारण उसे प्रसन्‍नता मिलने वाली है….। आलीशान भवन, धन, सुख-साधन, वह सोचता है कि इन्‍हीं चीजों के कारण वह प्रसन्‍न है। समस्‍या धन-दौलत की नहीं है, समस्‍या है आदमी की दृष्‍टि की जो धन खोजने का प्रयास करती है। दृष्‍टि यह होती है, जब तक मेरे पास ये तमाम चीजें नहीं हो जाती है, मैं प्रसन्‍न नहीं हो सकता हूं। यह आदमी सदा दुखी रहेगा। एक सच्‍चा सादगी पसंद आदमी जान लेता है कि जीवन इतना सीधा सरल है कि जो कुछ भी है उसके पास, उसी में वह खुश हो सकता है। इसे किसी दूसरी चीज के लिए स्‍थगित कर देने की उसे कोई जरूरत नहीं है।
तब सादगी का अर्थ होगा: तुम्‍हारी आवश्‍यकताओं तक आ जाओ; इच्‍छाएं पागल होती है, है,आवश्‍यकताएं स्‍वाभाविक होती है। भोजन, घर, प्रेम; तुम्‍हारी सारी जीवन ऊर्जा को मात्र आवश्‍यकताओं के तल तक ले आओ। और तुम आनंदित हो जाओगे। और एक आनंदित व्‍यक्‍ति धार्मिक होने के अतिरिक्‍त और कुछ नहीं हो सकता। और एक अप्रसन्‍न व्‍यक्‍ति अधार्मिक होने के अतिरिक्‍त और कुछ नहीं हो सकता। हो सकता है वह प्रार्थना करे, हो सकता है, वह मंदिर जाए,हो सकता है। मस्‍जिद जाये। उससे कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला। एक अप्रसन्‍न व्‍यक्‍ति कैसे प्रार्थना कर सकता है? उसकी प्रार्थना में गहरी शिकायत होगी। दुर्भाव होगा। वह एक नाराजगी होगी। प्रार्थना तो एक अनुग्रह का भाव है, शिकायत नहीं।
इसलिए ध्‍यान रहे। जितने ज्‍यादा कब्‍जा जमाने की वृति से जुड़ते हो, उतने ही कम प्रसन्‍न होओगे तुम। जितने कम प्रसन्‍न होते हो तुम,उतने ही दूर तुम हो जाओगे परमात्‍मा से, प्रार्थना से, अनुग्रह के भाव से। सीधे-सहज होओ। आवश्‍यक बातों सहित जीओं और भूल जाओ आकांक्षाओं के बारे में; वे मन की कल्‍पनाएं है, झील की तरंगें है। वे केवल अशांत ही करती है, तुम्‍हें वे किसी संतोष की और तुम्‍हें नहीं ले जा सकती है।
ओशो
पतंजलि—योग-सूत्र,
भाग—2
प्रवचन-11
21अप्रैल, 1975, पूना

Laughing meditation osho

हंसना कुछ ऊर्जा तुम्हारे अंतर्केंद्र से परिधि पर ले आती है। ऊर्जा हंसने के पीछे छाया की भांति बहने लगती है। तुमने कभी इस पर ध्यान दिया? जब तुम वास्तव में हंसते हो, तो उन थोड़े से क्षणों के लिए तुम एक गहन ध्यानपूर्ण अवस्था में होते हो। विचार प्रक्रिया रुक जाती है। हंसने के साथ-साथ विचार करना असंभव है। वे दोनों बातें बिलकुल विपरीत हैं: या तो तुम हंस सकते हो, या विचार ही कर सकते हो। यदि तुम वास्तव में हंसो तो विचार रुक जाता है। यदि तुम अभी भी विचार कर रहे हो तो तुम्हारा हंसना थोथा और कमजोर होगा। वह हंसी अपंग होगी।

जब तुम वास्तव में हंसते हो, तो अचानक मन विलीन हो जाता है। जहां तक मैं जानता हूं, नाचना और हंसना सर्वोत्तम, स्वाभाविक व सुगम द्वार हैं। यदि सच में ही तुम नाचो, तो सोच-विचार रुक जाता है। तुम नाचते जाते हो, घूमते जाते हो, और एक भंवर बन जाते हो--सब सीमाएं, सब विभाजन समाप्त हो जाते हैं। तुम्हें इतना भी पता नहीं रहता कि कहां तुम्हारा शरीर समाप्त होता है और कहां अस्तित्व शुरू होता है। तुम अस्तित्व में पिघल जाते हो और अस्तित्व तुममें पिघल आता है; सीमाएं एक-दूसरे में प्रवाहित हो जाती हैं। और यदि तुम सच ही नाच रहे हो--उसे नियंत्रित नहीं कर रहे बल्कि उसे स्वयं को नियंत्रित कर लेने दे रहे हो, स्वयं को वशीभूत कर लेने दे रहे हो--यदि तुम नृत्य से वशीभूत हो जाओ, तो सोच-विचार रुक जाता है।

हंसने के साथ भी ऐसा ही होता है। यदि तुम हंसी से आविष्ट और आच्छादित हो जाओ तो सोच-विचार रुक जाता है।

निर्विचार की दशा के लिए हंसना एक सुंदर भूमिका बन सकती है।

हंसी ध्यान के लिए निर्देश
हर सुबह जब जागें, तो अपनी आंखें खोलने से पहले, शरीर को बिल्ली की तरह तानें। तीन या चार मिनट बाद, आंखें बंद रखे हुए ही, हंसना शुरू करें। पांच मिनट के लिए बस हंसें ही। पहले-पहले तो आप इसे सप्रयास करेंगे, लेकिन शीघ्र ही आपके प्रयास से पैदा की गई ध्वनि प्रामाणिक हंसी को जगा देगी। स्वयं को हंसी में खो दें। शायद इस घटना को वास्तव में घटने में कई दिन लग जाएं, क्योंकि हम इससे बहुत अपरिचित हैं। परंतु शीघ्र ही यह सहज हो जाएगा और आपके पूरे दिन का गुण ही बदल जाएगा।

हंसते हुए बुद्ध
जापान में हंसते हुए बुद्ध, होतेई की एक कहानी है। उसकी पूरी देशना ही बस हंसना थी। वह एक स्थान से दूसरे स्थान, एक बाजार से दूसरे बाजार घूमता रहता। वह बाजार के बीचों-बीच खड़ा हो जाता और हंसने लगता--यही उसका प्रवचन था।
उसकी हंसी सम्मोहक थी, संक्रामक थी--एक वास्तविक हंसी, जिससे पूरा पेट स्पंदित हो जाता, तरंगायित हो जाता। वह हंसते-हंसते जमीन पर लोटने लगता। जो लोग जमा होते, वे भी हंसने लगते, और फिर तो हंसी फैल जाती, हंसी की तूफानी लहरें उठतीं, और पूरा गांव हंसी से आप्लावित हो जाता।

लोग राह देखते कि कब होतेई उनके गांव में आए, क्योंकि वह अद्भुत आनंद और आशीष लेकर आता था। उसने कभी भी एक शब्द नहीं बोला--कभी भी नहीं। तुम बुद्ध के बारे में पूछो और वह हंसने लगता; तुम बुद्धत्व के बारे में पूछो और वह हंसने लगता; तुम सत्य के बारे में पूछते कि वह हंसने लगता। हंसना ही उसका एकमात्र संदेश था।

-ओशो
ध्यानयोग: प्रथम और अंतिम मुक्ति

Wednesday, 24 June 2015

Secret of life(osho)

जीवन में कोई रहस्य है ही नहीं। या तुम कह सकते हो कि जीवन खुला रहस्य है। सब कुछ उपलब्ध है, कुछ भी छिपा नहीं है। तुम्हारे पास देखने की आंख भर होनी चाहिए।
यह ऐसा ही है जैसी कि अंधा आदमी पूछे कि 'मैं प्रकाश के रहस्य जानना चाहता हूं।' उसे इतना ही चाहिए कि वह अपनी आंखों का इलाज करवाए ताकि वह प्रकाश देख सके। प्रकाश उपलब्ध है, यह रहस्य नहीं है। लेकिन वह अंधा है- उसके लिए कोई प्रकाश नहीं है। प्रकाश के बारे में क्या कहें? उसके लिए तो अंधेरा भी नहीं है- क्योंकि अंधेरे को देखने के लिए भी आंखों की जरूरत होती है।
एक अंधा आदमी अंधेरा नहीं देख सकता। यदि तुम अंधेरा देख सकते हो तो तुम प्रकाश भी देख सकते हो; ये एक सिक्के के दो पहलू हैं। अंधा आदमी न तो अंधेरे के बारे में कुछ जानता है न ही प्रकाश के बारे में ही। अब वह प्रकाश के रहस्य जानना चाहता है।
अब हम उसकी मदद कर सकते हैं उसकी आंखों का ऑपरेशन करके। प्रकाश के बारे में बड़ी-बड़ी बातें कह कर नहीं- वे अर्थहीन होंगी। जिस क्षण अहंकार बिदा हो जाता है, उसी क्षण सारे रहस्य खुल जाते हैं। जीवन बंद मुट्ठी की तरह नहीं है; यह तो खुला हाथ है।
लेकिन लोग इस बात का मजा लेते हैं कि जीवन एक रहस्य है- छुपा रहस्य। अपने अंधेपन को छुपाने के लिए उन्होंने यह तरीका निकाला है कि छुपे रहस्य हैं कि गुह्य रहस्य है जो सभी के लिए उपलब्ध नहीं हैं, या वे ही महान लोग इन्हें जान सकते हैं जो तिब्बत में या हिमालय में रहते हैं, या वे जो अपने शरीर में नहीं हैं, जो अपने सूक्ष्म शरीर में रहते हैं और अपने चुने हुए लोगों को ही दिखाई देते हैं।
और इसी तरह की कई नासमझियां सदियों से बताई जा रही है सिर्फ इस कारण से कि तुम इस तथ्य को देखने से बच सको कि तुम अंधे हो। यह कहने की जगह कि 'मैं अंधा हूं', तुम कहते हो, 'जीवन के रहस्य बहुत छुपे हैं; वे सहजता से उपलब्ध नहीं हैं। तुम्हें बहुत बड़ी दीक्षा की जरूरत होती है।'
जीवन किसी भी तरह से गुह्य रहस्य नहीं है। यह हर पेड़-पौधे के एक-दूसरे पत्ते पर लिखा है, सागर की एक-एक लहर पर लिखा है; सूरज की हर किरण में यह समाया है- चारों तरफ जीवन के हर खूबसूरत आयाम में। और जीवन तुम से डरता नहीं है, इसलिए उसे छुपने की जरूरत ही क्या है?
सच तो यह है कि तुम छुप रहे हो, लगातार स्वयं को छुपा रहे हो। जीवन के सामने अपने को बंद कर रहे हो क्योंकि तुम जीवन से डरते हो। तुम जीने से डरते हो- क्योंकि जीवन को हर पल मृत्यु की जरूरत होती है। हर क्षण अतीत के प्रति मरना होता है।
यह जीवन की बहुत बड़ी जरूरत है- यदि तुम समझ सको कि अतीत अब कहीं नहीं है। इसके बाहर हो जाओ, बाहर हो जाओ! यह समाप्त हो चुका है। अध्याय को बंद करो, इसे ढोये मत जाओ! और तब जीवन तुम्हें उपलब्ध है।
अभी के द्वार में प्रवेश करो और सब कुछ उदघाटित हो जाता है- तत्काल खुल जाता है, इसी क्षण प्रकट हो जाता है। जीवन कंजूस नहीं है। यह कभी भी कुछ भी नहीं छुपाता है, यह कुछ भी पीछे नहीं रोकता है। यह सब कुछ देने को तैयार है, पूर्ण और बेशर्त। लेकिन तुम तैयार नहीं हो।

Tension & relax

तनाव और विश्राम
हम शरीर में जो तनाव महसूस करते हैं, उसका मूल कारण है कुछ बनने की इच्छा। हर आदमी कुछ न कुछ बनने की चेष्टा कर रहा है। जो जैसा है, उसके साथ संतुष्ट नहीं है। हमारा होना स्वीकृति नहीं है, उसे इंकार किया जा सकता है और दूर कहीं एक लक्ष्य निर्मित किया जाता है। तो मूलभूत तनाव है-जो तुम हो और तुम बनना चाहते हो, उसके बीच की दूरी।
तुम जिसकी भी आकांक्षा करते हो वह भविष्य में पूरी होगी। आज तुम जो भी हो, उससे तुम्हारा कोई लेना-देना नहीं है। लक्ष्य जितना असंभव होगा, उतना तनाव अधिक होगा। तो भौतिकवादी आदमी इतना तनावपूर्ण नहीं होगा, जितना कि आध्यात्मिक व्यक्ति, क्योंकि उसका आदर्श व लक्ष्य बड़ा ऊंचा है।
तुम और तुम्हारे लक्ष्य के बीच जितनी दूरी होगी उतना तनाव अधिक, दूरी जितनी कम होगी, तनाव भी कम। यदि तुम स्वयं से पूर्णतया संतुष्ट हो तो तनाव बिल्कुल नहीं है। तुम इस क्षण में जीते हो। मेरी दृष्टि में, तुम्हारे होने और बनने के बीच कोई दूरी नहीं हो तो तुम धार्मिक हो।
इस दूरी के कई तल हो सकते हैं तुम जिसकी आकांक्षा करते हो, अगर वह कोई शारीरिक वस्तु है तुम्हारे भौतिक शरीर मे तनाव होगा। जैसे तुम सुंदर दिखना चाहते हो-इसका तनाव तुम्हारे भौतिक शरीर में शुरू होगा। यदि वह बना रहा, मजबूत होता चला गया तो भीतर के गहरे तलों पर पहुँचेगा।
यदि तुम मानसिक शक्ति के लिए तरस रहे हो तो मानसिक तल पर तनाव शुरू होगा और वहां से फैलेगा। इसका फैलना ऐसे ही है, जैसे तुम तालाब में पत्थर फेंको तो वह एक खास बिंदु पर गिरता है, लेकिन उसकी लहरें फैलती चली जाती हैं। तो तनाव तुम्हारे सात शरीरों में से किसी भी शरीर में शुरू हो सकता है, लेकिन इसका कारण वह बना रहता है-तुम्हारे होने और बनने के बीच की दूरी।
तनाव से मुक्त होने का एक ही उपाय है-स्वयं का संपूर्ण स्वीकार। संपूर्ण स्वीकार से चमत्कार घटित होता है। यह एकमात्र चमत्कार है। ऐसे व्यक्ति को खोजना, जिसने स्वयं को पूरी तरह से स्वीकार कर लिया है, एक आश्चर्यजनक घटना है।
अस्तित्व में कोई तनाव नहीं हैं। तनाव पैदा होता है गैर—अस्तित्वगत, काल्पनिक संभावनाओं से। वर्तमान में कोई तनाव नहीं है। कल्पना तुम्हें भविष्य की और दौड़ाती है, उसी से तनाव पैदा होता है। आदमी जितना कल्पनाशील हो, उतना तनाव में जीता है। तब फिर कल्पना विनाशक हो जाती है।
कल्पना रचनात्मक भी हो सकती है। यदि तुम्हारी कल्पना की पूरी क्षमता इस क्षण में केन्द्रित हो, आगे नहीं दौड़ रही हो तो तुम देख सकते हो कि तुम्हारा होना एक कविता है। तुम्हारी कल्पना शक्ति जीने में खर्च हो रही है, योजनाएं बनाने में नहीं। वर्तमान में जीना ही तनाव मुक्त जीना है।
...यदि तुम्हारा शरीर तनाव मुक्त वर्तमान में जी सके तो सही अर्थों में स्वास्थ्य का जन्म होता है। शरीर ऐसे विश्राम को उपलब्ध होता है, जो तुमने कभी नहीं जाना होगा। तब उसके लिए क्षण ही शाश्वत हो जाता है। फिर तो तुम भोजन ले रहे हो तो खाना ही सब कुछ होगा। उसके आगे न कुछ है, न पीछे कुछ है। भोजन करने वाला कोई नहीं होगा, भोजन की क्रिया ही सब कुछ होगी।
यदि तुम दौड़ लगा रहे हो और दौड़ना तुम्हारी समग्रता बन गई हैं, दौड़ने से जो संवेदनाएं उठ रही हैं, उनके साथ यदि तुम एक हो गए हो, उनसे अलग-थलग नहीं हो, तो तुम्हारा शरीर एक विधायक स्वास्थ्य को अनुभव करता है। शरीर के तल पर तुमने विश्रामपूर्ण अंतरतम को अनुभूत कर लिया।
-ओशो
'दी साइक्लोजी ऑफ दी इसोटेरिक'

Monday, 22 June 2015

Treatment for eyes

मोतियाबिंद और आँखों को स्वस्थ रखने के उपाय-
नेत्र रोगों में कुदरती पदार्थों से ईलाज
करना फ़ायदेमंद रहता है। कम उम्र में चश्मा
लगना आजकल आम बात होती जा रही है| लेकिन
ऐसा नहीं है कि किसी कारण से एक बार चश्मा
लग गया तो वह उतर नहीं सकता | ऐनक लगने के
प्रमुख कारण आँखों की भली प्रकार देख रेख
नहीं करना,पोषक तत्वों की कमी, या आनुवांशिक
हो सकता है| इनमें से आनुवांशिक को छोडकर
अन्य कारण से लगा चश्मा सही देख भाल ,व् खान
पान का ध्यान रखने के आलावा देशी उपचार के
द्वारा उतारा जा सकता है|
मोतियाबिंद बढती उम्र के साथ अपना
तालमेल बिठा लेता है। अधिमंथ बहुत ही खतरनाक
रोग है जो बहुधा आंख को नष्ट कर देता है।
आंखों की कई बीमारियों में नीचे लिखे सरल
उपाय करने हितकारी सिद्ध होंगे-
१) सौंफ़ नेत्रों के लिये हितकर है।
मोतियाबिंद रोकने के लिये इसका पावडर
बनालें। एक बडा चम्मच भर सुबह शाम पानी के
साथ लेते रहें। नजर की कमजोरी वाले भी यह उपाय
करें।
२) विटामिन ए नेत्रों के लिये अत्यंत
फ़ायदेमंद होता है। इसे भोजन के माध्यम से
ग्रहण करना उत्तम रहता है। गाजर में भरपूर बेटा
केरोटिन पाया जाता है जो विटामिन ए का
अच्छा स्रोत है। गाजर कच्ची खाएं और जिनके
दांत न हों वे इसका रस पीयें। २०० मिलि.रस दिन
में दो बार लेना हितकर माना गया है। इससे
आंखों की रोशनी भी बढेगी। मोतियाबिंद
वालों को गाजर का उपयोग अनुकूल परिणाम
देता है।
३) आंखों की जलन,रक्तिमा और सूजन हो जाना
नेत्र की अधिक प्रचलित व्याधि है। धनिया
इसमें उपयोगी पाया गया है।सूखे धनिये के बीज
१० ग्राम लेकर ३०० मिलि. पानी में उबालें।
उतारकर ठंडा करें। फ़िर छानकर इससे आंखें
धोएं। जलन,लाली,नेत्र शौथ में तुरंत असर मेहसूस
होता है।\
४) आंवला
नेत्र की कई बीमारियों में लाभकारी माना गया
है। ताजे आंवले का रस ५ मिलि. इतने ही शहद में
मिलाकर रोज सुबह लेते रहने से आंखों की
ज्योति में वृद्धि होती है। मोतियाबिंद रोकने
के तत्व भी इस उपचार में मौजूद हैं।
५) भारतीय परिवारों में खाटी भाजी की सब्जी
का चलन है।इसका अंग्रेजी नाम इन्डियन सोरेल
है| खाटी भाजी के पत्ते के रस की कुछ बूंदें
आंख में सुबह शाम डालते रहने से कई नेत्र
समस्याएं हल हो जाती हैं। मोतियाबिंद रोकने
का भी यह एक बेहतरीन उपाय है।
६) अनुसंधान में साबित हुआ है कि कद्दू के
फ़ूल का रस दिन में दो बार आंखों में लगाने
से मोतियाबिंद में लाभ होता है। कम से कम दस
मिनिट आंख में लगा रहने दें।
७) घरेलू चिकित्सा के जानकार विद्वानों का
कहना है कि शहद आंखों में दो बार लगाने से
मोतियाबिंद नियंत्रित होता है।
८) लहसुन की २-३ कुली रोज चबाकर खाना
आंखों के लिये हितकर है। यह हमारे नेत्रों के
लेंस को स्वच्छ करती है।
९) पालक का नियमित उपयोग करना मोतियाबिंद
में लाभकारी पाया गया है। इसमें
एंटीआक्सीडेंट तत्व होते हैं। पालक में पाया
जाने वाला बेटा केरोटीन नेत्रों के लिये परम
हितकारी सिद्ध होता है। ब्रिटीश मेडीकल
रिसर्च में पालक का मोतियाबिंद नाशक गुण
प्रमाणित हो चुका है।
१०) एक और सरल उपाय बताते हैं| अपनी दोनों
हथेलियां आपस में रगडें कि कुछ गर्म हो
जाएं| फिर आंखों पर ऐसे रखें कि ज्यादा दबाव
मेहसूस न हो। हां, हल्का सा दवाब लगावे। दिन
में चार-पांच बार और हर बार आधा मिनिट के
लिये करें। आंखों की रोशनी बढाने का नायाब
तरीका है|
११) किशमिश ,अंजीर और खारक पानी में रात को
भिगो दें और सुबह खाएं । मोतियाबिंद और
ज्योति बढाने की अच्छी घरेलू दवा है।
१२) भोजन के साथ सलाद ज्यादा मात्रा में
शामिल करें । सलाद पर थोडा सा जेतून का तेल
भी डालें। इसमें प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत
करने के गुण हैं जो नेत्रों के लिये भी
हितकर है।
१३) पाठकों , अब मैं वो उपचार बता रहा हूँ
जिससे कई लोगों के चश्मे उतर गए हैं| नेत्र
ज्योति वर्धक इस उपचार की जितनी भी प्रशंसा
की जाय थोड़ी है| इसमें तीन पदार्थ जरूरी हैं|
बड़ी सौंफ,मिश्री और बादाम | तीनों बराबर
मात्रा में १००-१०० ग्राम लेकर महीन पीस लें |
कांच के बर्तन में भर कर रखें| रात को सोते
वक्त 1० ग्राम चूर्ण एक गिलास गरम दूध के
साथ लें| यह प्रयोग ४०-५० दिन तक निरंतर करना
है|
१४) सूरज मुखी के बीजों का सेवन करना आंखों
के लिए सेहतमंद रहता है| इसमें विटामिन
सी,विटामिन ई,बीता केरोटीन और
एंटीआक्सीडेंटस होते है जो आंखों की
कमजोरी दूर करते हैं|
१५) दूध व् अन्य डेयरी उत्पाद का पर्याप्त
मात्रा में उपयोग करना नेत्र विकारों में
फायदेमंद रहता है| इन चीजों से आखों को
उचित पोषण मिलता है|
१६) केवल बादाम का सेवन भी आँखों के लिए
बहुत फायदेमंद होता है| रोजाना चलते फिरते
८-१० बादाम खाने से जरूरी मात्रा में
विटामिन ई प्राप्त होने से आँखें स्वस्थ
रहती हैं| बादाम में
प्र्प्तीं,रेशा,वसा,विटामिन और मिनरल
पर्याप्त मात्रा में होते हैं| आयुर्वेद में
उल्लेख है कि बादाम को भिगोकर खाने के बजाय
अंकुरित करके खाना ज्यादा लाभप्रद होता है|
अंकुरित करने के लिये बादाम १२ घंटे पानी में
भिगोएँ | छानकर बादाम सुखालें| कांच के जार
में रखें और अंकुरित होने के लिये ३- ४ दिन
फ्रीज में रखें|
रात को नो बादाम भिगोएँ ,सुबह पीसकर पानी
में घोलकर पी जाएँ| इससे आँखे स्वस्थ रहती
हैं| और निरंतर उपयोग से आँखों का चश्मा भी
उतर जाएगा|
१७) आँखों को स्वस्थ रखने के लिए सोया
मिल्क ,दही,मूंगफली,खुबानी का उचित मात्रा
में सेवन करना लाभ दायक है|
१८) एक शौध के अनुसार हरे पतेदार सब्जियों
में केरोटिन नामक पिगमेंट की ऐसी मात्रा
मौजूद रहती है जिसमें आँखों की रोशनी तेज
करने की क्षमता होती है| विशेषज्ञों के
अनुसार यह कुदरती केरोटीनाईड आँख की पुतली
पर सकारात्मक प्रभाव डालता है और आँखों की
रोशनी सुरक्षित रखने के अलावा अनेक नेत्र
रोगों से भी बचाव करता है|
१९) एक चने के दाने बराबर फिटकरी को सेककर
इसे १०० ग्राम गुलाब जल में डालें और रोजाना
सोते वक्त २-बूँदें आँख में डालने से चश्मे
का नंबर कम हो जाता है|
२०) बिल्व पत्र का ३० मिली रस पीने और २-४
बूँद रस आँखों में काजल की तरह लगाने से
रतौंधी रोग में लाभ होता है| अंगूर का रस भी
आँखों के लिए वरदान तुल्य माना गया है|
२१) इलायची आँखों के लिये बहुत लाभदायक
होती है\ रात को सोने से पहले २ इलायची पीसकर
दूध में डालें| अच्छी तरह उबालकर फिर मामूली
गरम हालत में पी जायें| इससे आँखों की रोशनी
बढ़ती है|
२२) अनुलोम-विलोम प्राणायाम करते रहने से
नेत्र ज्योति बढ़ती है|
२३) हल्दी की गांठ को तुवर की दाल में उबालकर
फिर छाया में सुखाकर रखलें| इसे पानी में
घिसकर सूर्यास्त से पूर्व आँखों में काजल की
तरह लगाएं | आँखे स्वस्थ रहती हैं और आँखों
की लालिमा भी दूर होती है|

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     ·    ·  ....... प्रेम आत्मा का भोजन है। प्रेम आत्मा में छिपी परमात्मा की ऊर्जा है। प्रेम आत्मा में निहित परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग ...